Tuesday, September 28, 2010

बिलकुल खामोश है फुर्सतगंज की खुशी...!

काल्पनिक फोटो. साभार google
फिल्म बंटी और बबली तो याद होगी आपको. एक नाम भी ज़हन में होगा. फुर्सतगंज.  पहले यूपी के रायबरेली में था ये इलाका. बीते दिनों मायावती सरकार ने अमेठी और रायबरेली के कुछ हिस्सों को तोड़कर नया जिला बनाया. नाम छत्रपति शाहूजी महाराज नगर. अब फुर्सतगंज नए जिले का हिस्सा है.
     
रविवार सुबह 8 बजे फुर्सतगंज के सरवन गाँव में संतोष अपने घर में बैठा था. साथ थी बीवी और 7 साल की बेटी खुशी. अचानक गाँव का सरपंच अपने साथियों के साथ आया. पहले उसकी बीवी को पीटने लगा. बेटी को भी मारा. संतोष कमरे में अपनी बहन को फोन पर कह रहा था, जान बचा लो मेरी. दबंगों को  भनक लगी कि संतोष कमरे के अंदर है तो दरवाज़ा तोड़कर उसे बाहर ले आये. उसके सामने ही खुशी को मारने लगे. संतोष बोला, बेटी को मत मारो, चाहो तो मेरी जान ले लो. फिर शुरू हुआ दरिंदगी का खेल. जमकर पीटने के बाद दबंगों ने संतोष का एक हाथ और एक पैर काट दिए. खुशी चारपाई के नीचे से अपने पापा को मरता देख रही थी. संतोष की बीवी गाँव के हर दरवाज़े पर गयी लेकिन वहाँ कोई 'मर्द' नहीं था जो दबंग सरपंच के खिलाफ बोलता.

एक घंटे तक ये सब हुआ लेकिन पुलिस नहीं पहुंची. इसके बाद नए जिले की पुलिस एक तरफ से आ रही थी तो कातिल दूसरी तरफ से जा रहे थे. लोग कहते हैं कि कातिलों का एक गुट पुलिस थाने में बैठा था. पुलिस को सब पता था. जब पुलिस की जीप आई तो तडपता संतोष दर्द से उछल रहा था ज़मीन पर. मरा नहीं था लेकिन. पुलिस ने संतोष की बीवी से कहा, इसे उठा कर जीप में रखो. समस्या ये थी की पहले जीप में क्या रखे? कटा हाथ, पैर या बाकी शरीर. किसी तरह सब कुछ जीप में रखा. कुछ दूर जाकर संतोष मर गया.

असली कहानी के बारे में ये बता दें कि संतोष गुवाहाटी में नौकरी करता था. उसका एक भाई सरपंच की लड़की को भगा ले गया था. जवाब में सरपंच ने संतोष के छोटे भाई अखिलेश को किडनैप कर लिया. पुलिस को ये भी पता था. फोन पर अखिलेश ने संतोष से कहा था, मेरी जान बचा लो भैया. संतोष भाई के लिए गुवाहाटी से आया था. वो अनजान था कि फुर्सतगंज अब दूसरे जिले में है. वो सीधा गया रायबरेली के एसपी के पास. बोला, जान बचा लीजिए हमारी. एसपी बोले,  हमारा जिला नहीं है पर वहाँ इत्तिला कर देते हैं. जब दबंग संतोष को मार रहे थे तो उसकी बहन ने 6 बार रायबरेली में 100 नंबर पर फोन किया और बताया कि भाई को बचाओ. पुलिस बोली, दूसरे जिले का मामला है. बोल देते हैं. दोनों जिलों की पुलिस सोच रही थी, पहले कौन जाएगा? मौका-ए-वारदात से पुलिस थाना सिर्फ 4 किलोमीटर दूर था. नए जिले के पुलिस वाले आये एक घंटे बाद. जब संतोष अलग और उसके हाथ-पैर अलग हो चुके थे. सोमवार को लोगों ने नाराज़ होकर सड़क जाम की तो फिर लाठी चली. नेता संतोष के घर आने लगे हैं. कहते हैं कड़ी सजा मिलेगी कातिलों को. पापा के क़त्ल के बाद खुशी एकदम खामोश है. एकबार रोई भी नहीं. पता नहीं क्या हो गया ?

कुछ दिन पहले राहुल गाँधी भी थ्रीजी मोबाइल सर्विस शुरू करने इसी गाँव गए थे. लोगों को पता ही नहीं है कि अब वो दूसरे जिले का हिस्सा हैं. नेताओं ने कुछ बताया ही नहीं. सरकारी कारिंदे कुछ सुनते नहीं है. रायबरेली वाले अफसर भगा देते हैं. यूपी के हर शहर हर गाँव में सूबे की सरकार ने होर्डिंग लगा रखी है. मोटे-मोटे शब्दों में लिखा है.... सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय. 

( लेखक प्रवीन मोहता भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं.)

Monday, September 27, 2010

What would we get from Commonwealth Games?

DHEERAJ KUMAR 

( Writer is IIMC alumnus and presently working for CNBC-AAWAAZ)
This is the question which was hovering in my mind since the first news regarding mishandling of the funds for Commonwealth Games came into light. The games are miles behind the Olympics or Asiad so far the level of competitiveness or the participation of countries is concerned. Except a few countries (Canada, UK, Australia and South Africa) the members of commonwealth do not possess any might in sport's world. US, China, Japan, France and Germany like super sports power are not the part of these games and due to this the commonwealth games are loosing its importance. So even if we win, many medals in the games, it would be just an eyewash as the most of the medal winners of the games fail to perform at the sporting events like Olympics or World Championships. So, when Delhi was announced the host for 19th CWG, it was not seen as Indian might in sport's world but an indicator of the respect India can get owing to its economic development in recent years. And, here the question pops up that whether we would be able to do what we are expected to?
courtesy : google.com
      It may seem cynical on my part that I am not very hopeful about the outcomes of the CWG but I have my own reasons to believe so. Just look at some figures; we have spent the whopping 77,000 crores of rupees to host the games and compare this with the amount spent on last CWG held in Melbourne and the amount to be spent in next games in Glasgow, which were less than Rs. 5,000 crores and about Rs. 2500 crores respectively. So was there any need to spent so much of public money on games, which can't give you the return whether on geo-political front or on the international sport's arena? I must say that with this money we can make a well-planned developed city easily. So, even if you decide to splurge so much money on CWG, why did not spend the money to develop a city on the outskirts of Delhi so that the fruits of benefits could reach to the people who have been devoid of these so far.
       I must present some more figures before you to make the picture clear. The budgetary allocation for education in 2010 is Rs. 31,036 crores, for health Rs. 22,300 crores and for ambitious MNREGS Rs. 40,000 crores. It means with the amount spent on CWG, we can provide at least the existing quality of healthcare and educational facility to our people for more than one year. It also means that the Government had opened its coffer for commonwealth games (and consequently allowed the CWG OC to loot it as well). Now, if the money spent here shows desired (and deserved) results in the future, we can console ourselves that this is not wasted. But even after being an optimistic, I have serious doubts that it would happen. At least coming reports regarding CWG solidify my doubts. Am I becoming too cynical, only time will tell. So wait for the Commonwealth games to be finished. 

Sunday, September 26, 2010

जलता झरिया, बुझते लोग

संदीप झा 
(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं और वर्तमान में डीडी न्यूज में कार्यरत हैं.)
कोयलांचल का नाम आते ही ज़हन में धनबाद की तस्वीर उभरती है। धनबाद से ही सटा एक छोटा सा शहर है झरिया। झरिया से हमारा-आपका वास्ता कभी-कभी टीवी चैनलों पर सड़क पर पड़ी दरारों के बीच से निकलती आग की लपटों की विजुअल से ही होता आया है। इससे पहले शायद ही कभी राष्ट्रीय स्तर पर झरिया का ज़िक्र हुआ होगा। जमाने से झरियावासी कोयला के रूप में अपने पास मौजूद संसाधन पर गर्व करते आए थे लेकिन उन्होंने शायद ही कभी सोचा होगा कि उनकी जमीन के नीचे मौजूद कोयला उनके जी का जंजाल बन जाएगा। 
कुछ यूँ सुलग रही है झरिया के नीचे की धरती. साभार : GOOGLE 
     दरअसल झरिया शहर के नीचे जो लाखों टन कोयला दबा हैं उसमें आग लग गई है और 'झरिया बचाओ समिति'  के कार्यकर्ताओं की मानें तो जानबूझकर आग लगा दी गई है। आग के हालात कितने भयावह हो चुके हैं,  इसका अंदाज शाम के वक्त शहर में घुसते ही हो जाता है। शहर के चारो ओर उठती हुई नीली लपटें झरिया का काला सच बन गयी हैं। आग का प्रकोप अभी शहर की बाहरी चौहद्दी तक ही है,  बावजूद इसके सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन एक लाख परिवारों को विस्थापित किया जाना जरूरी हो गया है। ज़ाहिर है एक लाख परिवारों के विस्थापन का मतलब तकरीबन पांच लाख लोगों को उनकी ज़मीन से उजाड़ना होगा। और वो भी तब जब आग अभी शहर के बाहर ही है। कोयला कंपनियों की मनमानी चलती रही तो बकौल झरिया बचाओ समिति, पूरा शहर खाली कराना होगा। दरअसल कोयला कंपनियों ने सरकार पर दबाव बना कर इसकी प्रक्रिया शुरू भी कर दी है। पहले उस रास्ते से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को अपना मार्ग बदलना पड़ा फिर खतरनाक मानते हुए झरिया रेलवे स्टेशन को बंद कर नए जगह पर स्टेशन बनाने की कवायद शुरू कर दी गई। और अब झरिया के लोगों को डंडे के बल पर जबरदस्ती विस्थापित करने की तैयारी में प्रशासन को लगाए जाने की तैयारी है। नीचे जलती आग और बरसात के दिनों में जम़ीदोज होने की घटना ने अब तक झरिया के कई लोगों की जाने भी ले ली हैं। लेकिन राज्य सरकार और केंद्र सरकार लालफीताशाही और कोयले की सरकारी कंपनियों के मनमर्जी के आगे बेबस नज़र आ रही है। 
बकौल झरिया बचाओ समिति ये पूरा मामला बीसीसीएल की ओपन कास्ट माइनिंग की नीति पर जोर देने का नतीजा है। समिति इसके पीछे छिपे स्वार्थ को उद्धघाटित करते हुए कहती है कि झरिया में पहले ओपन कास्ट माइनिंग नहीं होती थी। कोयला भूमिगत खनन के ज़रिए निकाला जाता था। लेकिन 90 के दशक के मध्य से बीसीसीएल ने कम खर्च और ज्यादा उत्पादन की नीति अपनाते हुए ओपन कास्ट माइनिंग का सहारा लिया। जिसका नतीजा अब सामने है। समिति का आरोप है कि इसके जरिए महज उपरी सतह का ही कोयला निकल पाता है जबकि झरिया के नीचे तकरीबन 2000 फीट तक कोयले का भंडार मौजूद है। शुरूआती 500 फीट की खुदाई के बाद कंपनी उस जमीन को यूं ही छोड़ कर जमीन के अगले हिस्से में खुदाई शुरू कर देती है। जिससे तेजी से उत्पादन तो बढ़ता है लेकिन नीचे तकरीबन 1500 फीट गहराई तक का कोयला बर्बाद होने के लिए या कोयला माफिया के लिए छोड़ दिया जाता है। 
इन छोड़ी हुई कोयला खदानों पर कोयला माफियाओं की गिद्द दृष्टि पहले से ही होती है। जिसका नतीजा होता है  बाकी बचे हुए कोयले के लिए अवैध खनन की शुरूआत जिसकी बंदरबाँट में तकरीबन हरेक स्टेक होल्डर का हिस्सा होने की संभावना से शायद ही कोई इंकार करेगा। यही अवैध खनन कोयले में आग की वजह होती है जो धीरे-धीरे नीचे तक पहुंच कर झरिया शहर के अंदर तक पहुँचने की ओर तेजी से बढ़ रही है। इस आग से झरिया वासियों के लिए भले ही अपने जमीन और घर से उजड़ने की नौबत आ गई है लेकिन कोयला के काले सौदागरों की पौ बारह हो रही है। इसी क्रम में झरिया बचाओ समिति पूछती है कि आखिर जो कोयला अंडरग्राउंड माइनिंग के जरिए आसानी से, बिना किसी नुकसान और किसी को विस्थापित किए निकाला जा सकता है , उसके लिए ओपन कास्ट माइनिंग क्यों? समिति पूछती है कि मान लीजिएझरिया की जमीन बीसीसीएल को दे भी दी जाए तो क्या इनकी भूख बस इससे खत्म हो जाएगी। अगला नंबर उससे आगे के कस्बे या गाँव का नहीं आएगा? समिति आगे कहती है कि यहीं पाँच किलोमीटर की दूरी पर प्राइवेट कंपनी की खानों में अंडर ग्राउंड माइनिंग के जरिए कोयला निकालने का काम सालों से चल रहा है लेकिन वहाँ कभी कोई हादसा नहीं हुआ, फिर बीसीसीएल को ही ओपन कास्ट माइनिंग की क्यों पड़ी है। क्या इसी एक बात से बीसीसीएल की कारगुजारी का खुलासा नहीं हो जाता। 
समिति आगे कहती है कि बीसीसीएल को दरअसल इस नीति से को चालू रखने के फायदे भी कई हैं। दुनिया की सबसे मंहगी जमीन (इस बात के लिए उनके पास पर्याप्त तर्क है। दरअसल झरिया में मिलने वाले कोयला कोकिंग  कोल है जिससे इस्पात की सफाई का काम बखूबी होता है जो उच्चतम कोटि के कोयले से ही संभव है। जाहिर है जिस ज़मीन के भीतर ये कोयला है वो दुनिया की सबसे नहीं तो कम से कम भारत की सबसे मंहगी ज़मीन होने का हक तो रखती है।) औने-पौने दाम में बीसीसीएल को मिलता जा रहा है। महज 500 फीट खुदाई से जो कोयला निकल पाए, उससे उत्पादन भी हर साल बढ़ता हुआ दिख रहा है और इससे जो विस्थापन की समस्या आ रही है उससे केंद्र सरकार निपटे। बीसीसीएल के हाथ सिर्फ लड्डू ही लड्डू। कोई उत्तरदायित्व नहीं।
 ये तो थी समस्या की जड़ , समस्या का दूसरा पहलू यहीं से शुरू होता है। दरअसल इस मामले पर झरिया के कुछ लोगों का एक समूह लगातार कानूनी से लेकर हर तरह की लड़ाई लड़ रहा है। कोर्ट के दबाव के बाद अग्निचक्र के घेरे में आ रहे लोगों के विस्थापन और इस समस्या से निपटने के लिए एक योजना भ बनाई गई है जिसमें लोगों को विस्थापित करने और लगी आग बुझाने के लिए दो स्तरों पर काम होना है। इसके लिए 7000-8000 करोड़ रूपए की राशि स्वीकृत भी की गई है, केंद्र सरकार की तरफ से। जिसमें से 2000 करोड़ रूपया आग बुझाने पर खर्च किया जाना है। लेकिन झरिया बचाओ समिति के रमेश खन्ना बताते हैं कि यहाँ भी बीसीसीएल अपनी करनी से बाज नहीं आ रहा है। आग बुझाने का काम तो कितनी गंभीरता से किया जा रहा है वो आप शाम को झरिया पहुँचते ही देख लेते हैं लेकिन विस्थापितों को बसाने के लिए पायलट योजना के तौर पर 2300 मकान शुरूआती तौर पर बनाए गए हैं जिसमें जाने के लिए कोई भी विस्थापित परिवार तैयार नहीं है।
रमेश खन्ना बताते हैं कि इसमें तीन मंजिले अपार्टमेंट बनाए गए हैं। जिसमें एक-एक मंजिल एक-एक परिवार को दी जानी है। प्रत्येक मंजिल पर 9.5 *11  का एक कमरा किचन-बाथरूम सहित एक परिवार को दिया जाना है। ज़ाहिर है औसतन चार-पांच सदस्यों वाले एक परिवार के लिए देश की सबसे मंहगी जमीन के बदले में दिया जाने वाला ये सौदा कोई भी मंजूर नहीं कर सकता। खन्ना साहब आगे जोड़ते हैं,  चलिए किसी तरह चार पांच लोगों वाला एक ग्रामीण परिवार इस दड़बेनुमा फ्लैट में रह भी ले तो अपने जानवर कहाँ बांधे? अपार्टमेंट की छत पर?  लिहाजा 2300 फ्लैट बन कर तैयार हैं लेकिन कोई परिवार इसमें आने को तैयार नहीं। उस पर तुर्रा ये कि ये शहर से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। वहाँ आकर रहने वाले लोगों के लिए रोज़गार का कोई साधन उपलब्ध नहीं है।
पूरी कहानी सुनाने के बाद जो सवाल झरिया बचाओ समिति पूछती है, उससे सिर्फ झरियावासियों का सरकार के प्रति गुस्सा ही ज़ाहिर नहीं होता बल्कि पूरी व्यवस्था ही एक तरह से कठघरे में खड़ी नज़र आती है।  रमेश खन्ना कहते हैं, आखिर देश की सबसे मंहगी ज़मीन का सौदा राज्य की नक्सली आत्मसमर्पण नीति में मिलने वाले मुआवजे से भी काफी कम है। ऐसे में सरकार क्या झरिया वालों को खुद अपनी तरफ से नक्सली बनने की राह पर नहीं धकेल रही ? सवाल जायज है लेकिन इसका जबाव शायद झरिया बचाओ समिति के पास भी नहीं। कोयले की नीली लौ में सिर्फ झरिया ही नहीं जल रहा है। झरियावासियों के मन में ये सवाल भी शायद अभी हल्की लौ में ही जल रहा है। डर है कहीं ये सवाल एक बड़े विस्फोट का रूप न धर ले।

Friday, September 24, 2010

नीतीश के विकास पर बटन दबाएगा बिहार !

मनोज मुकुल 
(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र हैं और 'स्टार न्यूज' में कार्यरत हैं) 
बिहार में नीतीश कुमार का सहारा है विकास। नारा भी विकास ही है। चूंकि बिहार की राजनीति बिना जात-पात के संपूर्ण नहीं है लिहाजा नीतीश को ये जोड़-तोड़ करना पड़ रहा है। वैसे पार्टी नेता विकास के भरोसे आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। होना भी चाहिए क्योंकि इससे पहले के पंद्रह साल की तुलना में नीतीश का पांच साल कई गुणा भारी पड़ता है। नीतीश के नेता, कार्यकर्ताओं का सीना इसलिए भी फूला हुआ है कि फीड बैक विकास को लेकर सही आ रहा है। विरोधी भी विकास की दुहाई दे रहे हैं। हालांकि चुनाव है नतीजों का जोड़ घटाव तो वोट देने से पहले तक बदलता रहता है फिर भी आकलन जो कोई भी कर रहा है हवा नीतीश के पक्ष में बता रहा है। 

बिहार के कुछ लोगों की बातों पर गौर करें तो, पिछली सरकार की तुलना में नीतीश की सरकार में किए गए कुछ काम बेहतर कहने लायक है। राजधानी पटना ही नहीं बिहार के ज्यादातर इलाकों में सड़कें चलने लायक हो गई हैं। कानून व्यवस्था के हालात भी बेहतर हुए हैं। शाम होते ही बाजारों की रौनक गायब हो जाती थी कम से कम इन पांच सालों में लोगों का मनोबल बढ़ा है। जिस तरीके से लालू-राबड़ी के राज में कानून तोड़ने वालों का मनोबल बढ़ा था कम से कम नीतीश के राज में कानून पर भरोसा करने वालों का मनोबल मजबूत हुआ है। पहले लोग दूसरों से तुलना करते थे अब लोग अपने में मस्त होने लगे है। विकासशील व्यवस्था की पहचान इसको मान सकते हैं। लिहाजा इस विकासशील व्यवस्था को विकसित बनाने के लिए जरूरी है कि बिहार को कम से कम पांच साल के लिए नीतीश पर भरोसा करना चाहिए। बिहार की एक पूरी पीढी ने कभी विकास नाम का शब्द बिहार की धरती पर नहीं सुना था। आज पहली बार उस पीढ़ी का नौजवान अपने घर में अपनों से विकास की बात सुन रहा है। बचपन उसका जंगल राज के साये में गुजरा था.. थोड़ा सयाना हुआ तो उसने विकास की परिभाषा को समझने की कोशिश की.. अब वो विकास की बात घर से लेकर बाहर तक सुन रहा है। मतलब नई पीढ़ी के जरिये बिहार के गांव और कस्बों में विकास लौट रहा है। आज राजनीति को समझने वाला हर शख्स देश की राजनीति को समझ रहा है उसमें अगर कोई दो पैसा भी बेहतर करता है तो दांव उसपर लगाने में कोई बुराई नही है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बहुत कुछ बदलाव हुआ है.. वैसे बिहार में बहुत चीजें ऐसी है जिसे करने की जरूरत है। नीतीश के समर्थक भी यही बात कह रहे हैं, पंद्रह साल या फिर उससे पहले के शासन में जो नहीं हुआ उसे अगर कोई करना चाहता है तो उसे मोहलत दी जानी चाहिए। कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आज की तारीख में पहले की तुलना में  शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून व्यवस्था, सड़क के मामले में बिहार ने तरक्की की है।
 दिल्ली, नोएडा, मुंबई के बाद मीडिया के मामले में बिहार आज पावर सेंटर बनकर उभर रहा है। हालांकि इंडस्ट्री, बिजली, रोजगार के अवसर जैसे मामलों में बिहार को काम करने की जरूरत है। पहले के नेता इन मामलों के बारे में सोचते तक नहीं थे, आज अगर कोई सोच रहा है तो कम से कम उसे उसका ड्राफ्ट तैयार करने का वक्त मिलना चाहिए। भरोसा सबसे बड़ी चीज है अब तक बिहार को किसी पर भरोसा नहीं था लेकिन आज बिहार किसी की तरफ मुंह उठाकर देख तो रहा है। लिहाजा जाति, धर्म से उपर उठकर इस बार बिहार में विकास के इसी हथियार को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी कर रहे हैं नीतीश कुमार। और हां बिहार का हर शख्स अपना एक राजनीतिक नजरिया रखता है इसलिए उसे पाठ पढ़ाना आसान नहीं होता। अब सवाल उठता है कि बिहार का वो नजरिया 15 साल तक कहां था। इसका जवाब आप इस रूप में समझ सकते हैं कि बिहार को तब यही पसंद था। जिस लालू को जमाने में बिहार के सभी धर्म, जाति, संप्रदाय के लोगों ने 1990 में मदद की थी उन्हीं लोगों ने 2005 में लालू को उखाड़ दिया। लालू को उखाड़ने के लिए बिहार में किसी को बाहर से नहीं बुलाना पड़ा। लालू के साथी रहे लोगों ने ही उन्हें धरातल का रास्ता दिखाया था। अब चूंकि नीतीश के राज में लालू-राबड़ी राज की तरह कोई बड़ी शिकायत नहीं मिली है कि इसे धरातल का रास्ता अभी ही दिखा दिया जाए। अभी तो बिहार के पुनर्निर्माण की शुरुआत है। लिहाजा बिहार के हर धर्म, जाति, संप्रदाय. बड़े, छोटे लोगों को बिहार के विकास में अपनी भागीदारी को सुनिश्चित करने का वक्त आया है। उम्मीद है इस बार अपने बिहार को और बेहतर बनाने के लिए बिहार बेहतर फैसला करेगा। आदमी उम्मीद किससे करता है, उसी से जो उसकी उम्मीदों पर खड़ा उतरता है। 
पहले के लोग उम्मीद नहीं करते थे, अब किसी ने उम्मीद करना सिखाया तो लोग उम्मीद करने लगे हैं। शायद यही वजह है कि लोग नीतीश कुमार से और ज्यादा उम्मीद कर रहे हैं...जिन उम्मीदों पर नीतीश की सरकार खड़ी नहीं उतरी उसी को भुनाने में लगे हैं सरकार के विरोधी। उपर ही मैंने जिक्र किया कि बहुत कुछ करने की जरूरत है सो एक बार उसी उम्मीद के भरोसे बिहार का बेहतर भविष्य चुनिए, ताकि बिहार से बाहर रहने वाले लोग अपने बिहार की दुहाई दे सके। लेकिन सवाल अब भी है कि क्या नीतीश के विकास पर बटन दबाएगा बिहार।