Friday, September 24, 2010

मेरी यादों में अयोध्या...!

( लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र और फ्रीलांसर हैं)

सुशांत झा 
 अयोध्या में जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी तो उस वक्त मैं शायद 7वीं क्लास में था। गांव में किसी बुजुर्ग के मौत की बरसी का भोज था। बीबीसी पर खबर आई थी कि बाबरी मस्जिद को जमींदोज कर दिया गया। लोगों ने उसे बाद में बीबीसी उर्दू पर विस्तार से सुना। पता नहीं बीबीसी वालों ने उस वक्त उसे क्या कहा था, मस्जिद या विवादित ढांचा याद नहीं आता। लेकिन जो बात याद आती है वो ये कि खबर सुनते ही मानों लोगों में एक उन्माद सा छा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि ये ब्राह्मणों का भोज था, पता नहीं दलितों और पिछड़ों में इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई। वैसे भी अपने आपको अपवार्डली मोबाईल मानने वाले ब्राह्मण-सवर्ण ज्यादातर बीबीसी सुनते थे और कुछ पढ़े लिखे पिछड़े-दलित भी। ये उस समय का एक दस्तूर सा था कि शाम को पटना आकाशवाणी की खबर के बाद लोग बीबीसी सुनते थे।
पटना में लालू प्रसाद नाम का एक नेता मुख्यमंत्री बन चुका था और पिछड़ों में उन्हें लेकर एक उन्माद के हद तक आशावादिता थी। बिहार के सवर्ण उस दौर में सार्वजनिक स्थलों पर विवादों से बचने की भरसकर कोशिश करते थे। खाते-पीते लोगों ने बड़े पैमाने पर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजना शुरु कर दिया था। बाबरी मस्जिद उस एक तबके के लिए बड़ा आश्वासन बनकर आया था जब उसे लगा कि इस बहाने कम से कम वो अपने आपको अलग-थलग होने से बचा सकता था। बाबरी ध्वंस के बाद मेरे सूबे में दंगे नहीं हुए थे, यूं तनाव जरुर था। इस दंगे के न होने में एक बड़ी भूमिका लालू प्रसाद की जरुर थी जिन्होंने पिछड़ों और दलितों को बहकने नहीं दिया था। यूं, इससे पहले बिहार, भागलपुर और सीतामढ़ी का कुख्यात दंगा झेल चुका था। लेकिन बाबरी ध्वंस  के बाद ऐसी बात नहीं हुई। दो महीने बाद भोपाल से मेरे चचेरे भाई आए थे तो बिहार में आए पिछड़ा उभार पर मर्सिया गाने के बाद भोपाल में हुए हिंदू-मुस्लिम झगड़े पर जरुर सीना चौड़ा कर रहे थे।
ये वहीं दौर था जब बिहार- या यूं कहें कि पूरे उत्तर भारत का पूरा का पूरा सवर्ण तबका कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी का मुरीद होने लगा था। उस वक्त अखबारों में नरसिम्हा राव की तस्वीर ऐसे छपती थी जैसे वे आज के कलमाड़ी हों। वाजपेयी ने एक तबके में अपनी जगह बनानी शुरु कर दी थी। उसके बाद हम पटना आ गए थे और पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त होते गए। जब-जब बीजेपी उफान पर होती तो हमें लगता कि लालू की काट सामने आ रही है।
वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो लोगों खासकर सवर्णों और कट्टरपंथी किस्म के हिंदुओं में उसी तरह की खुशी हुई थी, जब बाबरी ढ़हाई गई थी। कुछ उदारपंथी किस्म के लोगों ने वाजपेयी में एक आश्वासन ज़रूर देखा था। वाजपेयी सरकार ने जब परमाणु परीक्षण करने का फैसला लिया तो लोगों ने इसे एक तरह के हिंदू उभार से कम नहीं देखा था। लेकिन बीजेपी के कोर वोटरों में तब निराशा होने लगी तब बीजेपी की सरकार ने गठबंधन को बचाने के लिए राममंदिर को किनारे करना शुरु कर दिया। इसके उलट उन वोटरों ने जब प्रमोद महाजनों, अरुण शौरियों-जेटलियों को कारोबारियों के समर्थकों की भूमिका में देखा तो शायद उन्हें लगा कि बीजेपी को तो उन्होंने इसके लिए वोट किया ही नहीं था। साल 2004 आते-आते बीजेपी विकास के नाम पर 'इंडिया शाईनिंग' का नारा भले ही गढ़ बैठी लेकिन उसके कोर समर्थकों में कोई उत्साह बाकी नहीं था। पार्टी औंधे मुंह गिरी। लगा कि कांग्रेस और बीजेपी में कोई फर्क ही नहीं है।
ऊपर की व्याख्या जरुर दक्षिणपंथी किस्म की है लेकिन ये मेरे जैसे इंसान का नितांत निजी अनुभव है जो खास सामाजिक परिस्थियों में पले-बढ़े होने की वजह पैदा हुआ था।
वाजपेयी सरकार के मध्याह्न काल तक हिंदुओं के एक वर्ग में जो उम्मीद बाकी थी वो साल 2010 तक आते-आते बिल्कुल खत्म हो चुकी है। अब जमीन पर कोई तनाव नहीं है। यूं, ये एक ऐसा मसला जरुर है जो काफी संवेदनशील है और कुछ भी भविष्यवाणी करना खतरनाक है। लेकिन साल 2010 तक आते-आते लगभग पूरा का पूरा राजनीतिक और समाजिक तबका इस बात का लगभग मुरीद हो चुका है कि जो होगा वो अब अदालत के फैसले से ही होगा।   
मुझे अपनी दादी की बात याद आती है। वो एक धार्मिक महिला थी जो रह-रह कर प्रयाग, बनारस, मथुरा-वृंदावन और जगन्नाथजी की चर्चा करती थी। लेकिन अयोध्या का जिक्र उसमें शायद ही आता था। पता नहीं या मेरी दादी की ही बात थी या शायद मेरे पूरे इलाके में ही ऐसी बात थी। अयोध्या को लेकर कभी कोई फेसिनेशन नहीं था। कुछ बुजुर्ग कहते हैं कि मिथिला के लोगों में वैसे भी अयोध्या को लेकर कोई बहुत लगाव नहीं था जहां सीता के साथ ऐसा बुरा बर्ताव हुआ था ! यहां मैं थोड़ा क्षेत्रीय हो रहा हूं। पता नहीं मामला क्या है। जब बाबरी ध्वंस हुआ था तो ऐसा लगता है कि मेरे गांव के लोगों में खासकर ब्राह्मणों में वो तात्कालिक उन्माद ही था जो लालू यादव के गद्दीनशीं होने की स्थिति में खुशी का कोई क्षण खोजने के लिए भी आया था। बाद में सारी बातें हवा हो गयीं। आज मेरे गांव में लोग उसी तरह उदासीन है। कुछ लोग जो उत्साहित लगते हैं वे शहरों में ही लगते हैं जहां टीवी चैनल और मीडिया के दूसरे माध्यम उन्हें रह-रह कर इस बात की याद दिला ही देते हैं।
 अपने देश में दलितों का मसला अंबेदकर और गांधी ने मिल-बैठकर सुलझाया था। पिछड़ा आरक्षण का मसला संसद और अदालत ने सुलझाया था। पता नहीं अयोध्या का क्या होगा? लोग तो कह रहे हैं कि अदालत का फैसला मान लेंगे। अच्छी बात है। लेकिन अगर समाजिक रुप से सर्वसम्मत फैसला हो तो शायद हल और भी मजबूत हो। लेकिन दिक्कत ये है कि गांधी और अंबेदकर जैसे कद्दावर हमारे बीच फिलहाल तो नहीं है। फिर भी हम उम्मीद क्यों छोड़ें ?

Thursday, September 23, 2010

बिहार : दल बदलने का रिपोर्ट कार्ड

मनोज मुकुल 

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल 'स्टार न्यूज' में कार्यरत हैं. ) 


27 सितंबर को पहले दौर के चुनाव के लिए बिहार में अधिसूचना जारी होगी। फिलहाल चुनाव से पहले दल बदल का काम जोरों पर है। बिहार के चुनाव में दिलचस्पी रखने वाले लोग ये जानना जरूर चाहेंगे कि कौन सा नेता अभी किस पार्टी में चला गया है। लिस्ट लंबी है। नजर डालिए...

1. अखिलेश सिंह (पूर्व केंद्रीय मंत्री) आरजेडी छोड़कर कांग्रेस में जा चुके हैं।
2. सुभाष यादव, आरजेडी से इस्तीफा,जेडीयू, ददन पहलवान की पार्टी में तय नहीं।
3. तस्लीमुद्दीन (पूर्व केंद्रीय मंत्री), आरजेडी छोड़ जेडीयू में शामिल।
4. सरफराज आलम, तस्लीमुद्दीन के बेटे, आरजेडी छोड़ जेडीयू में शामिल
5. इजहार अहमद (लोजपा विधायक, घनश्यामपुर) जेडीयू में शामिल
6. विजेंद्र चौधरी (निर्दलीय विधायक), मुजफ्फरपुर अब लोजपा में शामिल
7. राजेश सिंह (आरजेडी विधायक, धनहा) अब जेडीयू में शामिल
8. जमशेद अशऱफ(जेडीयू विधायक) बलिया, अब कांग्रेस में शामिल
9. सुखदेव पासवान, पूर्व सांसद (अररिया) बीजेपी से लोजपा अब कांग्रेस में शामिल
10. नागमणि(पूर्व मंत्री), जेडीयू से आरजेडी अब कांग्रेस में शामिल
11. सुचित्रा सिन्हा (कुर्था से जेडीयू विधायक), नागमणि की पत्नी अब कांग्रेस में शामिल
12. प्रभुनाथ सिंह (पूर्व सांसद, महाराजगंज) जेडीयू से आरजेडी में शामिल
13. अनिल कुमार (भोरे विधायक, आरजेडी) कांग्रेस में शामिल
14. गिरिधारी यादव (पूर्व सांसद, बांका) आरजेडी से कांग्रेस अब जेडीयू में शामिल
15. अरुण सिंह (पूर्व सांसद,जहानाबाद)जेडीयू,लोजपा,कांग्रेस होते जेडीयू में शामिल
16. राम लखन महतो (दलसिंहसराय से आरजेडी विधायक), अब जेडीयू में शामिल
17. अच्युतानंद सिंह (लोजपा विधायक, जन्दाहा) अब बीजेपी में शामिल
18. उपेंद्र कुशवाहा (पूर्व विधायक), जेडीयू, एनसीपी, होते हुए फिर जेडीयू में शामिल 
19. श्याम रजक (आरजेडी रमई राम(आरजेडी से कांग्रेस) जेडीयू में शामिल हो चुके हैं।
20. आनंद मोहन पत्नी लवली के साथ अभी कांग्रेस में हैं।
21. पप्पू यादव भी पत्नी के साथ अभी कांग्रेस में हैं।
22. कांटी विधायक अजीत कुमार अभी तो जेडीयू में हैं।
23. राजन तिवारी, लोजपा में हैं जेल में बंद।
24. जगन्नाथ मिश्रा, पुत्र नीतीश के साथ फिर से जेडीयू के साथ हैं।
25. सांसद ललन सिंह, तकनीकी तौर पर जेडीयू में हैं, दिल कांग्रेस में।
26. कैप्टन जयनाराण निषाद, मुजफ्फरपुर सांसद, जेडीयू से नाराज
27. पूर्णमासी राम, सांसद गोपालगंज, जेडीयू से नाराज



नवंबर 2005 चुनाव के कुछ जानने वाले तथ्य

जेडीयू और बीजेपी ने तालमेल कर 139 और 102 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे
जेडीयू को 88 सीटें मिली थी, बीजेपी को 55
आरजेडी ने कांग्रेस से तालमेल किया था। आरजेडी 175, कांग्रेस 51 सीटों पर लड़ी थी।
आरजेडी को 54, कांग्रेस को तब 9 सीटें मिली।
आरजेडी ने 10 सीटें सीपीएम के लिए छोड़ी थी। , एक पर जीत मिली
लोजपा ने सीपीआई, फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी से तालमेल किया था।
203 सीटों पर लड़कर लोजपा ने 10 सीटें जीती
35 सीटों पर लड़के सीपीआई को 3 सीटें मिली।



पहला दौर : मतदान 21 अक्टूबर, सीटें 47  

27 सितंबर से 4 अक्टूबर तक नामांकन, 5 को नामंकन पत्रों की जांच
7 अक्टूबर को नाम वापस लेने की अंतिम तारीख होगी।
मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा की 47 सीटें।
जेडीयू के पास अभी 16,बीजेपी 13, आरजेडी 5,कांग्रेस के पास 4 अन्य 8 सीटें हैं।
(किशनगंज में एक सीट बढ़ी है)



दूसरा  दौर : मतदान  24 अक्टूबर, सीटें 45 

29 सितंबर से 6 अक्टूबर तक नामांकन ,7 को जांच, 9 को नाम वापसी की आखिरी तारीख।
शिवहर,सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर,दरभंगा,समस्तीपुर,मोतिहारी(12 में से 5 सीट) की 45 सीटें।
जेडीयू के पास अभी 13,बीजेपी 7, आरजेडी के पास 18, एलजेपी 3, कांग्रेस 1, अन्य 2
(दरभंगा में एक नई सीट )



तीसरा दौर : मतदान 28 अक्टूबर, सीटें 48 

4 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक नामांकन,12 को जांच,14 नाम वापसी की आखिरी तारीख।
बेतिया, मोतिहारी, गोपालगंज, सीवान, छपरा, वैशाली की 48 सीटें।
जेडीयू के पास अभी 15, बीजेपी 14, आरजेडी 11, लोजपा 3, कांग्रेस 1,बीएसपी 1, अन्य 2
(मोतिहारी में एक नई सीट)

Wednesday, September 22, 2010

अब नीतीश पर 'नजर' डालिए..


(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल 'स्टार न्यूज' में कार्यरत हैं. ) 


मनोज मुकुल 
जॉर्ज, नीतीश जिंदाबाद, ललन,दिग्विजय जिंदाबाद।
नीतीश कुमार का जब तक राजतिलक नहीं हुआ था बिहार में कुछ ऐसे नारे लगते थे। 2005 से पहले के बैनर अगर किसी को याद है तो उनको ये नारा भी याद होगा। प्रचार के दौरान बैनरों पर सबसे ऊपर कुछ ऐसा ही लिखा होता था। लेकिन 2005 में जब नीतीश सत्तासीन हुए तो हालात बदल गये। 2010 आते आते हालात बहुत ज्यादा बदल चुके हैं। नीतीश को 2005 में सत्ता के करीब ले जाने वाले जिन चार नामों का जिक्र उस वक्त होता था उन चार में से तीन नाम आज नीतीश से दूर हैं। 
मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश ने सबसे पहले अपने राजनीतिक गुरु जॉर्ज को ठिकाने लगा दिया। शरद यादव ने पार्टी में जॉर्ज की जगह ले ली। राजनीतिक जीवन के आखिरी समय में जॉर्ज की जो स्थिति है उससे कोई अंजाना नहीं है। 20 साल तक नीतीश की राजनीति का प्रबंधन देखने वाले ललन सिंह नीतीश से दूर जा चुके हैं। 2005 में जब पार्टी सत्ता में आई थी ललन सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे, जॉर्ज राष्ट्रीय अध्यक्ष।प्रभुनाथ सिंह को नीतीश ने दरकिनार करना शुरू किया नतीजा आज वो लालू के साथ गलबहियां कर रहे हैं। इन नामों के अलावा नीतीश को सत्ता के शिखर पर ले जाने में अहम भूमिका निभाने वाले दिग्विजय सिंह का नाम भी प्रमुख है। बांका से सांसद रहे दिग्विजय दक्षिणी बिहार में पार्टी की कमान संभालते थे। बुद्धजीवियों का बड़ा वर्ग दिग्विजय के जरिये ही पार्टी के करीब था। लेकिन सत्ता में आने के बाद नीतीश ने दिग्विजय सिंह को भी साइड कर दिया। एनडीए की सरकार में समता पार्टी कोटे से तीन मंत्री हुआ करते थे जॉर्ज, नीतीश और दिग्विजय। पार्टी बनने के वक्त से ही दिग्विजय पार्टी के हर फैसले के गवाह रहे थे। लेकिन नीतीश ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें बांका से पार्टी का उम्मीदवार तक नहीं बनाया। लेकिन दिग्विजय न सिर्फ पार्टी से बगावत कर इस सीट से जीते बल्कि पार्टी के उम्मीदवार को लड़ाई के लायक भी नहीं छोड़ा। हालांकि दिग्विजय अब इस दुनिया में नहीं हैं। कहने का मतलब ये कि नीतीश को सत्ता के शीर्ष तक ले जाने वाले चेहरे सिर्फ बैनर पोस्टर से ही नहीं नीतीश के आसपास से भी दूर जा चुके हैं। सीएम बनने के बाद एकएक करके नीतीश ने पुराने साथियों को साइड करना शुरू किया तो नए नए लोगों को अपनी सिपहसलार बनाया। ये वो वक्त था जब लोकतांत्रिक पार्टी की जगह जेडीयू व्यक्ति विशेष के प्रभाव वाली पार्टी बनती जा रही थी। 2005 के चुनाव में बिहार ने नीतीश को वोट नहीं दिया.. वोट लोगों ने बदलाव को दिया और उस बदलाव का नेतृत्व नीतीश को दिया गया था। नेतृत्व देने वाले लोगों को ही नीतीश ने किनारा कर दिया। नीतीश की छवि इस वक्त पार्टी में तानाशाह की तरह उभरने लगी थी। इसकी पृष्ठभूमि नीतीश धीरे धीरे 2004 लोकसभा चुनाव के वक्त से ही लिख रहे थे... जब जॉर्ज को नालंदा सीट छोड़ने के लिए कहा और खुद नालंदा से लड़ने गये। नीतीश और जॉर्ज के बीच मनमुटाव की शुरुआत हो चुकी थी लेकिन बिहार में लड़ाई बदलाव की थी सो अंहकार को फिलहाल साइड रखा गया। हालांकि नीतीश की स्क्रिप्ट के मुताबिक राजनीति का खेल जारी था। एक जमाने में समता पार्टी का साथ छोड़कर गए शिवानंद तिवारी, वृषण पटेल ने लालू का साथ छोड़ फिर से नीतीश का दामन थाम लिया था। नीतीश ने गले लगाया और अहम जिम्मेदारियों से नवाजा। जिंदगी भर कांग्रेस की सियासत करने वाले जगन्नाथ मिश्रा 2004 में ही नीतीश के शरणागत हो गये थे। 
रामाश्रय प्रसाद सिंह भी नीतीश कुमार के साथ हो गए। जगन्नाथ मिश्रा के सुपुत्र को बिहार में मंत्री बनाया गया तो रामाश्रय सिंह खुद नीतीश सरकार में मंत्री बने। (यहां याद दिलाते चलें कि जब बिहार में कांग्रेस के कमजोर होने का दौर शुरू हुआ था जगन्नाथ मिश्रा ने अलग पार्टी बना ली थी तब बिहार में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे रामाश्रय सिंह) लालू का साथ छोड़ कर नीतीश का साथ देने आए मोनाजिर हसन जैसे नेता भी नीतीश के करीबी हो गये और कैबिनेट मंत्री बनाकर अहम मंत्रालय दिया गया। ये तो बात रही सत्तासीन होने के बाद के शुरुआती दिनों की.. लेकिन धीरे धीरे जैसे समय बीतता गया नीतीश ने अपने आसपास से पुराने वफादार नेताओं को साइड करना तेज कर दिया। नीतीश को कोई मलाल नहीं था कि उनके साथ कौन से लोग जुड़ रहे हैं और कौन से लोग उनसे दूर जा रहे हैं। लालू को जानने वाले लोग रंजन यादव को नहीं भूल सकते। लालू के बाद नंबर दो का दर्जा मिला था। बाद में लालू को धोखेबाज कहते हुए अलग हो गये थे। एक वक्त कहा जाता था कि लालू की पार्टी में लालू से ज्यादा रंजन यादव के समर्थक विधायक हैं। वो रंजन यादव नीतीश की टीम में शामिल हो गये। बाद में जेडीयू के टिकट पर पटना से सांसद बने। 2009 लोकसभा चुनाव के बाद तो परिस्थितियां बिल्कुल ही बदल गई। 25 में से 20 सीट जीतने के बाद नीतीश आसमान में थे और यही वक्त था जब नीतीश को और आसमान में ले जाने वाले लोग उनसे जुड़कर अपना नंबर सेट करने लगे। नीतीश तो प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में गिने जाने लगे थे। खैर चुनाव के तुरंत बाद विधानसभा उपचुनाव का जब वक्त आया तो रमई राम और श्याम रजकजैसे लालू के दाएं-बाएं बैठने वाले नेता नीतीश के साथ आ गए। (रमई राम के बारे में बता दें आपको लगातार चार बार से विधायकी जीत रहे थे.. पार्टी में दलितों का सबसे बड़ा चेहरा। लगातार लालू-राबड़ी राज में मंत्री, बेटी को लालू ने विधान पार्षद बनवाया। लोकसभा का टिकट नहीं दिया तो पार्टी छोड़ दी।) श्याम रजक जो लालू राबड़ी की शान में कसीदे गढ़ते थे। जो लालू के किचन कैबिनेट के मेंबर हुआ करते थे। उन्होंने भी लालू से किनारा किया तो नीतीश ने अपने गले लगा लिया। हालांकि नीतीश की पार्टी से रमई राम और श्याम रजक दोनों विधानसभा उपचुनाव हार गये। आगे बढ़िये तो विजय कृष्ण, जो विजय कृष्ण कई बार बाढ़ से सांसद रहे और 2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश को जिन्होंने हरा दिया था, 2009 चुनाव हारने और हत्या के एक केस में फंसने के बाद नीतीश के शरणागत हो गये। दर्जन भर से ज्यादा मुकदमों के आरोपी तस्लीमुद्दीन का नाम सुना होगा आपने, देवेगौड़ा की सरकार में मंत्री थे लेकिन गृह राज्यमंत्री के पद से हटा दिया गया था। नीतीश राज में कानूनी शिकंजा कसने का डर सताया तो नीतीश की शरण में ही चले गये। नीतीश ने इस बाहुबली नेता को तहे दिल से गले लगाया। उपेंद्र कुशवाहा, अरुण कुमार सिंह जैसे पुराने नेता समता पार्टी के संस्थापकों में से रहे लेकिन सरकार बनने के बाद ही नीतीश से इनके संबंध खराब हो गये... लेकिन राजनीतिक मजबूरी देखिए ललन सिंह की कमी को पाटने के लिए अरुण कुमार को वापस लाया गया है। बताते हैं कि ललन सिंह उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में वापस लाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले नागमणि(कोइरी) के पार्टी छोडकर जाने के बाद कोइरी नेता की जो कमी रह गई थी उसे पाटने के लिए उपेंद्र कुशवाहा को लाया गया है। उपेंद्र की वापसी ललन सिंह की मर्जी के बगैर हुई लिहाजा ललन कल्टी मार गये। अब उपेंद्र कुशवाहा की मर्जी के बगैर उस कोइरी जाति के विधायक को जेडीयू में शामिल कर लिया गया है जिसने 2005 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा को हरा दिया था। उपेंद्र कुशवाहा फिर से नाराज बताये जा रहे हैं। ललन सिंह के जाने के बाद विजय चौधरी को बिहार में पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। विजय चौधरी की पार्टी में वैसे तो पहले से कोई पहचान नहीं थी लेकिन अब कार्यकर्ता उनका नाम जान गये हैं। उधर जिस बांका से लालू की पार्टी के टिकट पर सांसद रहे गिरधारी यादव भी नीतीश की शरण में पहुंच चुके हैं। एक बात गौर करने वाली ये है कि चुनाव पूर्व दलबदल एक प्रक्रिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में उस चीज का ख्याल नहीं रखा जा रहा जो नीतीश सरकार की पहचान है। लालू और नीतीश में अब क्या फर्क रह गया है सिर्फ दोनों के चेहरों के अलावा। कल जो लालू के जंगल राज के मजबूत सिपाही थे आज की तारीख में वो नीतीश के राज के मजबूत सिपाही बन गये हैं। 
नीतीश के पास जो चौकरी आजकल चक्कर काट रही है उसको पहचानिए..... विजय चौधरी(अध्यक्ष, बिहार जेडीयू) कोई दाग नहीं है नई पहचान बना रहे हैं। शिवानंद तिवारी (राष्ट्रीय प्रवक्ता) दाग ही दाग, कब लालू की पार्टी में कब नीतीश के साथ उनको भी नहीं पता। श्याम रजक(सालों तक लालू की किचन कैबिनेट के सदस्य) खासियत देखिए- आज बिहार सरकार का पक्ष घूम घूम कर मीडिया में रख रहे हैं। साल भर पहले लालू के जंगल राज वाली पार्टी को छड़कर इधर आए हैं बयान सुनिएगा तो लगेगा कि लालू के जंगल राज के खिलाफ 94से लड़ रहे हैं। पहले लालू के लिए मीडिया को फोनो देते थे अब नीतीश के लिए फोनो देते हैं। रमई राम(90-2005 तक लगातार भूमि राजस्व मंत्री) नीतीश की पार्टी से विधानसभा उपचुनाव हारे तो क्या हुआ अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। बिहार में दलित-महादलित का फर्क कर जीत का गणित बनाने वाले नीतीश को पांच साल तक कोई दलित नेता नहीं मिला जिसे ये पद दे सके। खैर...अल्पसंख्यक चेहरों की कमी पड़ गई है जो पहले से थे वो नाराज चल रहे हैं... मोनाजिर हसन के बारे में भूल गये हैं तो बता देता हूं... 2005 में चुनाव से पहले लालू को छोड़कर आए थे जेडीयू से जीते भवन निर्माण मंत्री बनाया गया लालू-राबड़ी कैबिनेट में भी यही ओहदा था। खैर मुख्यमंत्री निवास खाली करने का विवाद 2005 में जब चर्चा में आया तो मोनाजिर ने लालू से पंगा लिया.. लालू ने इनको टीटीएम मंत्री बना दिया..माने.. ताबड़तोड़ तेल मालिश मंत्री कहकर पुकारा.. हालांकि नीतीश के सामने इनका नंबर बन गया.. लेकिन 2009 में जब से ये सांसद बने हैं उनका मामला ठीक नहीं चल रहा सो नीतीश अल्पसंख्यक नेताओं के ऑपरेशन में जुटे हैं। दो दिन पहले एलजेपी की पूरी अल्पसंख्यक यूनिट को पार्टी में ले आए.. अब उन्हीं की पार्टी के विधायक इजहार अहमद को भी ला रहे हैं। तस्लीमुद्दीन को पहले से ही चेहरा बनाकर घूमा रहे हैं। वैसे शहाबुद्दीन को भी अपनी पार्टी में लेने के इच्छुक थे नीतीश। सीवान दौरे के दिन पिछले महीने हीना शहाब से मिलने की पूरी तैयारी हो चुकी थी लेकिन लालू को खबर लगी और पलीता लग गया। लालू पहुंचे सीवान जेल और शहाबुद्दीन को समझा बुझाकर शांत कराया। कहने का मतलब ये कि लालू और नीतीश में फर्क अब सिर्फ दोनों के अपने चेहरे का रह गया है। क्योंकि सुशासन की परिभाषा लिखने वाले पुराने नेता नीतीश से किनारे हो चुके हैं और जंगल राज के सिपाही अब नीतीश के सिपहसलार बन गए हैं। जानकार बता रहे हैं कि नीतीश के राज में जिस तरीके से बाहुबलियों का बुरा हश्र हुआ है बचे खुचे दूसरे दलों के बहाबुली चुनाव के मौके पर सेफ हैंड खेल नीतीश दरबार में नंबर बनाने में जुटे हैं। भला हो बिहार का...अब जंगल राज वाले नेता नीतीश की पार्टी से जीतकर आएंगे तो नीतीश को कौन से राज का मुखिया बनाएंगे... जंगल राज का या सुशासन के राज का??? ऐसे नेताओं के बारे में बिहार को गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि एक आदमी ही गलत होगा ये कहना ठीक नहीं हो सकता क्योंकि उस आदमी के आसपास वाले लोग कहीं से भी ठीक नहीं माने जा सकते। लालू और उनके पुराने संबंधियों के बारे में कुछ ऐसा ही समझना पड़ेगा। क्या कहते हैं...????

Tuesday, September 21, 2010

कांग्रेस के आंगन में किलकारी...


 (लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल 'स्टार न्यूज' में कार्यरत हैं. )  

मनोज मुकुल 
20 साल बाद बिहार कांग्रेस के आंगन में किलकारी गूंज रही है। बीते 20 साल में कांग्रेस की यहां जो स्थिति थी वो किसी से छिपी नहीं है। सालों तक यहां कांग्रेसियों ने राज किया लेकिन एक बार हाथ से सत्ता निकली तो फिर पिछलग्गु बनकर रह गये। 
90 में लालू के सत्ता में आने के वक्त भी पार्टी हार भले गई थी लेकिन स्थिति बेहतर थी.. लेकिन धीरे धीरे नाम लेने वाला कोई नहीं बचा। सबसे बुरा वक्त तो कांग्रेसियों के लिए रहा 2004-2005 का। पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, कभी कांग्रेस विधायक दल के नेता (विपक्ष के नेता) रहे रामाश्रय प्रसाद सिंह, प्रदेश अध्यक्ष रामजतन सिन्हा जैसे जन्मजात कांग्रेसियों ने पार्टी से नाता तोड़ लिया। अपने राजनीतिक फायदे के लिए कोई नीतीश के साथ गया तो कोई पासवान के साथ। लेकिन एक बार फिर से दिन फिरने को है। पटना के सदाकत आश्रम में इन दिनों दिन में ही दिवाली मन रही है। रोज मिलन समारोह आयोजित हो रहे हैं। 
आज बिहार में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू से तालमेल कर कांग्रेस के 51 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। 9 सीटों पर जीत मिली। कुल 6.09 फीसदी वोट मिले, यानी 51 उम्मीदवारों को मिले 14 लाख 35 हजार 449 वोट। लेकिन लोकसभा 2009 के चुनाव में हालात बदल गये। हालांकि पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ लेकिन अकेले चुनाव लड़कर भी दो सीटों पर जीत मिली, और राज्य में कांग्रेस को जिंदा करने में मजबूती मिली। 2009 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी से नाता तोड़ कांग्रेस ने जो फसल बोने का काम किया था अब उसे इस विधानसभा चुनाव में उसके काटने का वक्त आ गया है। हालांकि कांग्रेस के पास बिहार में अब भी कोई सबसे बड़ा सर्वमान्य चेहरा नहीं है जिसके दम पर वोट मांगने की पार्टी हिम्मत कर सके। लेकिन बदले हालात में पार्टी किसी भी गठबंधन (लालू या नीतीश)को चुनौती देने की हैसियत में है इससे इनकार नहीं कर सकते। तभी तो लगातार नीतीश और लालू दोनों कांग्रेस पर वार करते दिख रहे हैं। अब खासियत देखिए कांग्रेस का जो शुरुआती आधार वोट रहा है उसका झुकाव फिर से पार्टी की ओर लौट रहा है। विधानसभा उपचुनाव 2009 में इसकी झलक देखने को मिली थी। देश की वर्तमान विषम राजनीतिक परिस्थितियों को भुनाने में विपक्षी नाकाम है लिहाजा बिहार में कांग्रेस को ललकारने का घाटा नीतीश और लालू को ही है। बाद इसके आज की तारीख में बिहार के ज्यादातर बाहुलबली कांग्रेस का दामन भी थामे हुए हैं। कोसी के इलाके में आनंद मोहन हों या फिर पप्पू यादव। लालू के साले साधु यादव भी कांग्रेस में ही हैं। रही सही कसर को संपूर्ण करने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश सिंह पहुंचने वाले हैं। कांग्रेस की स्ट्रेटजी पर गौर करें तो उसकी कोशिश बिहार के हर इलाके से एक बड़ा नाम और बड़े चेहरे को अपने साथ जोड़ने की है। अब अररिया के पूर्व बीजेपी सांसद सुखदेव पासवान भी कांग्रेसी हो गये हैं। बिहार में 21 अक्टूबर को पहल पहले दौर की वोटिंग है। और आज की तारीख में पार्टी सबसे मजबूत स्थिति में इसी इलाके में हैं। आनंद मोहन, पप्पू यादव भले जेल में हैं लेकिन इन बाहुबली पूर्व सांसदों की पूर्व सांसद पत्नियां कमान संभालने के लिए काफी है। दलित वोटरों के लिए इस इलाके में कभी सबसे बड़ा चेहरा रहे सुखदेव पासवान भी अब साथ हो गये हैं। प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के युवा अल्पसंख्यक चेहरा महबूब अली कैसर भी इसी इलाके से आते हैं। पहले दौर के चुनाव में अगर कांग्रेस अपने इन धुरंधरों के जरिये सही टिकट बंटवारे के साथ वोट मैनजमेंट का पुख्ता इंतजाम कर लेती है। तो इसका बड़ा संदेश बिहार के बाकी इलाकों में जाएगा, जो विरोधियों के प्राण सूखाने के लिए काफी हो सकता है। कांग्रेस की कमोबेश कोशिश यही होनी चाहिए। अखिलेश सिंह के पार्टी में शामिल होने के बाद बड़े भूमिहार नेता की जो कमी हो गई थी वो कमी भी पूरी हो जाएगी। 20 साल तक नीतीश की सियासत को चमकाने के लिए रणनीति बनाने वाले सांसद ललन सिंह के बारे में लगातार कहा जा रहा है कि इन दिनों वो कांग्रेस के लिए समीकरण बना रहे हैं... ऐसी बात है तो ये शुभ संकेत है पार्टी के लिए। पाला बदलने वाले नेताओं की आज की तारीख में कांग्रेस पहली पसंद हैं। लोकसभा टिकट न देने से नाराज दलबदल के माहिर खिलाड़ी नागमणि हों या फिर शराब के मुद्दे पर नीतीश सरकार में मंत्री पद छोड़ने वाले जमशेद अशऱफ, या अब गया के भोरे से विधायक विजय राम। इतना ही नहीं पूर्व सांसद और पूर्व विधायक तो थोक के भाव में हर हफ्ते शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस चूंकि दिल्ली से डील होने वाली पार्टी है लिहाजा हर नेता को शामिल कराने से पहले दिल्ली से हरी झंडी की जरूरत पड़ती है। इसी बीच में अगर पुराने बॉस को मालूम हो गया तो मनाने, बचाने का ऑपरेशन शुरू हो जाता है। इसके चक्कर में कांग्रेस के मिलन समारोह वाली लिस्ट और लंबी नहीं हो पाई है। खबर तो ये भी है कि लालू के दूसरे साले सुभाष यादव भी कांग्रेस की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं.. लेकिन जब तक साधु यहां डेरा जमाये हैं तब तकउनका आना डाउटफुल लग रहा है लेकिन राजनीति में कुछ साफ साफ आप कह भी नहीं सकते। पूर्व सांसद जयप्रकाश यादव को भी भाव नहीं मिल रहा सो वो भी लालू से कन्नी काटे हुए है आश्चर्य न हो किसी दिन उनके कल्टी मारने के बारे में भी सुन सकते हैं। कहने का मतलब ये कि कांग्रेस का आधार मजबूत तो हुआ है इसमें कोई आश्चर्य तो है नहीं। वैसे भी सहरसा में राहुल गांधी की जो रैली हुई उसको देखकर उस इलाके में जेडीयू और आरजेडी दोनों के कान खड़े हो चुके हैं. पहले चरण में कोसी और पूर्णिया के जिन 47 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमे से एनडीए के पास 29 सीटें हैं। (16 जेडीयू और 13 बीजेपी), लालू के पास 5 है तो कांग्रेस के पास 4 सीटें। मतलब थोक के भाव में खोने का आइटम यहां जेडीयू और बीजेपी के पास ही है। बिहार में कांग्रेस के नाम पर कोई बड़ा चेहरा भले न हो लेकिन अगर जातीय हिसाब से बांट दें तो... अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े चेहरे तो खुद प्रदेश अध्यक्ष महबूब अली कैसर हैं। 
राष्ट्रीय प्रवक्ता शकील अहमद, किशनगंज वाले सांसद असरारूल हक हैं। 2005 के चुनाव में जो 9 विधायक जीते थे उनमें से चार मुसलमान थे। बाद में कैसर और जमशेद अशरफ के बाद गिनती बढ़ गई। दलित चेहरे के रूप में विधायक दल के नेता अशोक राम के अलावा ताजा ताजा पार्टी में आए सुखदेव पासवान को भी गिन लीजिए। (मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष हो चुकी हैं) भूमिहार फेस वैसे तो रामजतन सिन्हा, अनिल शर्मा, महाचंद्र प्रसाद सिंह, शाही और पांडे खानदान जैसे लोग भी हैं.. लेकिन अखिलेश सिंह और ललन सिंह जैसे बड़े नाम के जुड़ने के बाद ताकत और ज्यादा बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। राजपूतों में लवली आनंद अपने आप में चेहरा है। लालू के यादव वोट में सेंधमारी के लिए कोसी, पूर्णिया में पप्पू यादव, और खुद लालू के घर वाले इलाके में साले साधु यादव। कुर्मी के वोट मिलने की गारंटी तो कांग्रेस के कोई भी बड़े नेता नहीं दे सकते लेकिन सदानंद सिंह अपने क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को भरोसा दे रहे हैं। रही बात 6 फीसदी वोट वाले कोइरी की तो नागमणी खुद को राज्य के सबसे बड़े कोइरी नेता मानते हैं.. 6 फीसदी पर न सही जहानाबाद, औरंगाबाद, पटना में थोड़ा बहुत प्रभाव तो है ही। वैसे भी नाम तो बड़ा ही है। कमी दिखती है तो ब्राह्मण नेता की। मिथलांचल इलाके में कांग्रेस को एक बड़ा नेता चाहिए... प्रेमचंद्र मिश्रा जैसे लोग भले ही पार्टी के लिए पुराने हों ऑफिस के लिए ठीक हैं वोट मांगने के लिए नहीं कह सकते। कहने का मतलब ये कि बिहार कांग्रेस के प्रभारी मुकुल वासनिक बड़ी ही महीनी से पार्टी के लिए ऑपरेशन चला रहे हैं। बिहार में नए बाहुबलियों की पहली च्वाइस भी कांग्रेस ही है। पिछले दो हफ्ते में पटना हवाई अड्डे से लेकर पार्टी कार्यालय तक मीडिया से बात करते मुकुल वासनिक की कोई भी तस्वीर देख लीजिए, उनके आसपास खड़े लोगों को जो जानते हैं आसानी से पहचान लेंगे। मुकुल वासनिक अपने स्ट्रेटजी में सफल होते दिख रहे हैं... अभी तक अनुशासन भंग होने की कोई खबर कांग्रेस के खेमे से नहीं आई है। पुराने दिन याद कीजिए अनिल शर्मा अध्यक्ष थे और हर मीटिंग में कुछ न कुछ खरमंडल होता था। लालू और पासवान से नाता तोड़कर कांग्रेस ने सिर्फ इन दोनों की मुश्किलें नहीं बढ़ाई हैं.. धड़कन नीतीश की भी तेज है। लालू से नाता तोड़ने का फायदा ही है कि एक तीसरा मजबूत विकल्प बिहार में तैयार हो गया है। इस चुनाव में 20 से 25 सीटें भी मिल जाती है (जो कि मिल सकती है) तो सत्ता की चाबी कांग्रेस के हाथ में होगी। लेकिन सवाल ये कि क्या त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में कांग्रेसी फिर लालू-पासवान से दोस्ती करेंगे। या बिहार में नीतीश के साथ कांग्रेस का नया गठबंधन बनेगा। नतीजों का इंतजार कीजिए। पहले चरण के चुनाव के बाद ही कांग्रेस की हैसियत की तस्वीर साफ हो जाएगी।