Tuesday, October 5, 2010

Who is this Shri Ram ?

DHEERAJ KUMAR
( Writer is IIMC alumnus and presently working in CNBC - AWAAZ)
Some days ago, I watched a package by NDTV's Kamaal Khan on Lord Shri Ram, wherein he described very beatuifully how the Vishwa Hindu Parishad (VHP) changed the image of Sri Ram in our minds. Kamaal Khan argued that the image of Ram was of a kind hearted and magnanimous but VHP changed it into an aggressive Ram. And, I was thinking that how true Kamaal had said and most of the Hindus in the country imbibed what VHP gave without thinking over it. Also, how cleverly these right wing hardliners brain washed the public mind about the importance of Ram temple in Ayodhya. The impact was so hard that it turned into a frenziness for making the temple and to the extent that people didn't hesitate to demolish the Babri Masjid in Ayodha.

Anyway, I don't want to go into the details of this black event which changed the equilibrium of the society at large. Here, I would raise some questions which were in my mind after going through the judgements by the Honorable High Court of Lucknow. The first question is about the change of status of Ram in our psyche. If you go through the judgement it says that Ram Lala was born at the place where the then Babri Masjid was. If I buy this argument, then Bhagwan Ram should be a historical figure like Akbar, Shivaji or Ashoka. But all of these great persons born on Indian land, it has archaelogical and historical proofs, but that proof is not available for Ram. So how can court decide that Ram was born at that very place?
Friends, remember that so far no one has proved the very existence of a person like Ram. As all of us know Ram is a mythological figure and myths can't be strong evidences in a court of law. There is no answer to the questions like when did the Ram born, what was the period when he ruled the land and so on? It is a well known fact that Ramayan and Mahabharat are the epics written during Vedic period and in due course of time, it took the shape of a religious scripture and Ram and Krishna became our deities. But whether these great persons walked on earth or not, no body can tell us for sure.
And, the second question which I would like to debate on whether the faith of the majority rule over the law of the land? If yes, this is the wrong precedence and against the democratic and secular principles. If not, then how can a judge decide on the basis of faith rather than empirical evidences and tangible proofs? If faith is to be believed then Sati should be promoted and widow remarriage should be banned. What else to say friends? Think about it and revert back to me with your arguments.



Saturday, October 2, 2010

माधव राव सिंधिया : मौत के कुछ अनसुलझे सवाल...

हृदेश सिंह 
(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र और यूपी के मैनपुरी जिले में 'सत्यम न्यूज चैनल' के मुख्य संपादक हैं.) 
भारतीय लोकतंत्र के करिश्माई नेताओं की अगर फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो  माधव राव सिंधिया उसमे से एक होंगे. आज जब हिंदुस्तान उम्मीद से है और आसमान छूने को है....ऐसे में माधव राव सिंधिया जैसे राजनेताओं की दे को बेहद जरुरत है.माधव राव सिंधिया देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे.वे जन्मजात राजा थे. रियाया से लेकर आवाम तक का दर्द वे महसूस करते थे. सिधिया घराने की वे बेहद प्रतिभाशाली कुंवर थे.यही वजह है की 30 सितबर 2001  में उनकी प्लेन हादसे मे मौत हुई तो पूरा देश रो पड़ा.....
माधव राव सिंधिया की मौत एक विमान हादसे में हुयी थी.उस वक्त में बीए में था और दैनिक जागरण, मैनपुरी में एक ट्रेनी रिपोर्टर था. अच्छे से याद है उस दिन बेहद तेज़ बारिश हो रही थी...में घर पर था. 2 बजे का समय रहा होगा. मेरे बॉस अनिल मिश्रा ने मुझे फ़ोन पर जानकारी दी कि कस्बा ''बेवर'' के पास एक हवाई जहाज़ क्रेश हुआ है. उन्होंने मुझे वहाँ जाने को कहा.मेने  हाँ कर दी....और जाने की तैयारी शुरू कर दी. उस वक्त विमान के  तकनीकी पक्ष की मुझे कोई  खास जानकारी नही थी. मैं कैसे रिपोर्टिंग कर पाउँगा.....ये सब सोचते हुए मैं कपड़े पहनते चला गया. घर से बहर निकला तो तेज़ बारिश ने एकबारी जाने से रोकने की नाकाम कोशिश की.... माँ ने एक बार रोका भी......लेकिन मैं निकल चुका था.
मेरे पत्रकार मित्र अशोक बाजपेई जो उम्र में लगभग 25 साल बड़े थे. बस स्टैंड पर इंतजार कर रहे थे. हम दोनों ने आखों ही आँखों में ही तुंरत चलने का इशारा किया और एक जीप में सवार हो गए.पानी तेज़ होने से गावं के संपर्क मार्ग टूट चुके थे. पता चला की जिस गावं में ये दुर्घटना हुई है उस गावं का नाम भैंसरोली है. इस गावं तक पहुचने में कई बाधाओं को पार करना पड़ा. तेज़ बारिश में कोई घर से नही निकल रहा था. पौने 3 बजे हम लोग उस गाँव में दाखिल हुए.  घरों के दरवाजों पर अजीब सा सन्नाटा था. सन्नाटे को चीरने के लिए बस बारिश का शोर था. जीप को 2 किलोमीटर दूर छोड़कर हम पैदल ही घटनास्थल की ओर चल पड़े. एक आम और कटहल के बाग़ से होकर हम उस खेत में पहुंचे जहाँ ये विमान दुर्घटनाग्रस्त पड़ा था. देख कर मेरे होश उड़ गए. तेज़ बारिश का पानी भी विमान की आग को बुझा नही पा रहा था. अभी तक मुझे नही पता था की इस में कौन सवार है. आलू के खेत में ओंधे पड़े इस विमान को देखकर मुझे ये एहसास हो गया था कि इसमें कोई नही बचा होगा..
दुर्घटनाग्रस्त विमान. (फाइल फोटो) 
मेने गाँव वालों को बुला कर विनती कर किसी तरह विमान का बायीं  तरफ का दरवाज़ा तोडा. अंदर का नजारा याद करके आज भी मेरी मेरी रूह काँप जाती है. विमान में सवार लोगों को सेफ्टी बेल्ट खोलने का मौका नही मिला था. सभी लोग सीटों से बुरी तरह चिपके हुए थे. पानी और आग ने लोगों के चेहरों को पुरी तरह से बिगाड़ दिया था. जैसे इन लोगों के मास्क विमान में डाल दिए हों. मुझे याद है की पहली लाश एक महिला की थी. ये इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर अंजू शर्मा थीं. मेने हाथों का सहारा देकर निकालने की कोशिश की लेकिन अंजू का जिस्म सीट से बुरी तरह से चिपका था. मांस को खिचता देख मदद कर रहे ग्रामीण को उलटी आ गयी. लाश को छुड़ते हुए वो बोला ''लला जे हमसे नाए हुये.......उसके इतना कहने पर मैंने गर्दन उठा कर अपने आगे पीछे देखा दो लोगों की तरफ इशारा किया.वे लोग मुह पर पड़ा बाँध कर मदद को आगे आए.
तब तक पुलिस एक अफसर दौड कर मेरे पास आए. उनका वायरलेस सेट माधव राव सिंधिया के बारे में संदेश दे रहा था. इतना सुन कर मैं मामला समझ गया किए ये हादसा मामूली नही है. पुलिस अफसर लाशों में अ़ब माधव राव सिंधिया को खोजने लगे. तभी मुझे पायलट की सीट के ठीक पीछे एक लाश सीट मे धंसी नजर आई.उसे निकल कर देखा.लाश के गले में माँ दुर्गा का सोने का एक लोकेट पड़ा हुआ था. मैंने तुरंत पुलिस अफसर को बताया कि ये ही माधव राव सिंधिया की लाश है.लाश की हालत देख कर मेरी आँख भर आई. एक राजा की इस तरह मौत.....मैं समझ नही पा रहा था. इस हादसे में सिंधिया सहित 8 अन्य लोग भी मारे गए थे. 
दुर्घटना की एक खासियत ये थी की विमान सेसना एयरकिंग 90 बिना ब्लैक बॉक्स का था.विमान का मलबा देख कर कहा जा सकता था कि ये एक जर्जर विमान है. ग्रामीणों के मुताबिक विमान में आग आसमान में ही लग चुकी थी. 
कैसे.... पायलट ने इमरजेंसी लेंडिंग की कोशिश की लेकिन विमान में कोई धमाका हुआ जिससे किसी को बचने का मौका नही मिला. बहारहाल ये सब जाँच के विषय होने चाहिए थे. दुर्घटना के बाद जाँच के लिए एक टीम गठित की गई लेकिन इस टीम ने जाँच में क्या पाया ये किसी को मालूम नही हो सका.ये दुर्घटना कैसी हुई ये अभी भी राज़ है. बताते हैं की इस विमान में ब्लैक बॉक्स नही था. अगर ऐसा है तो ख़िर इतने जिम्मेदार नेता को उस जहाज़ में जाने की इजाज़त किसने दी ?ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जबाव जानना बेहद जरुरी है.

Friday, October 1, 2010

सबसे बेशकीमती धान के पांच दाने !

मंजीत ठाकुर 

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्र और डीडी न्यूज के वरिष्ठ संवाददाता है.)  
चीन मे एक कहावत है- दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज़ हीरे-जवाहरात और मोती नहींधान के पांच दाने हैं। यह कहावत तब भी सच थी,  जब बनी होगी और आज भी उतनी ही सच है। शायद इसीलिए पश्चिमी दुनिया जहां भेड़ोंसू्अरोंकुत्तों और इंसानों की क्लोनिंग पर ध्यान दे रही हैवहीं भूख से जूझ रहे एशिया में धान के जीनोम की कड़ियां खोजी जा रही हैं।  नेचर पत्रिका में तो कुछ महीने पहले धान के जीनोमिक सीक्वेंस को छापा भी गया है।

एशिया समेत दुनिया के बड़े हिस्से में तीन अरब लोगों का मुख्य भोजन चावल है। लेकिन इस फसल से भोजन पाने वाली आबादी का ज़्यादातर हिस्सा अभी भी भूखा ही है। दुनिया भर में 80 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं और करीब 50 लाख लोगों की मौत कुपोषण की वजह से हो जाती है। आंकड़ों को और भी भयावह बनाता है यह तथ्य कि दुनिया की आबादी में हर साल 8 करोड़ 60 लाख लोग जुड़ जाते हैं। इस तेज़ी से बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अगले दो दशकों में चावल की उपज को 30 फ़ीसदी तक बढ़ाना होगा।

लाख टके का सवाल है कि यह चावल कहां और कैसे पैदा होगाआमतौर पर उपज बढ़ाने के दो तरीके सर्वस्वीकृत हैं। पहलाखेती के लिए ज़मीन को बढ़ाना या फिर पैदावार में बढ़ोत्तरी करना।
साठ के दशक के पहले,  पहले वाले विकल्प को ज्यादा आसान मानकर उसी पर अमल किया गया। परिणाम सबके सामने है। हमने विश्वभर में बहुमूल्य जंगलों की कटाई कर उनमें खाद्यान्न बो दिए और प्रदूषण और पारिस्थितिक असंतुलन को न्यौता दिया। लेकिन 60 के दशक में  नॉर्मन बारलॉग  जैसे वैज्ञानिकों ने स्थिति की नजाकत को भांपकर दूसरे विकल्प यानी पैदावार बढ़ाने पर जोर दिया। इसके लिए बीजों की गुणवत्ता में सुधार और तकनीकी साधनों की ओर ध्यान दिया जाने लगा। नतीजतन, हरित क्रांति सामने आई। जैसे ही पौधों की नई किस्में पूरे विश्व में बोई जाने लगी, फसल उत्पादन में भारी बढ़ोत्तरी हुई। ख़ासकर एशिया में यह वृद्धि की दर 2 फीसदी सालाना के आसपास रही।
फोटो साभार google 
सफर में कुछ पड़ाव भी आए। पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन में वृद्धि की दर मामूली रही,  तो यह सोच लिया गया कि चावल उत्पादन अब अपने चरम पर पहुंच चुका है और इसमें अधिक विकास की अब संभावना नहीं बची। ऐसे में सीमांत भूमियों पर उत्पादन बढ़ाना एक बड़ी चुनौती रही है,  जहां अधिकतर फसलें कीटों के प्रकोपरोगों या सूखे की वजह से खत्म हो जाती है।

कई वैज्ञानिक मानते हैं  कि दुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति तक खाना पहुंचाने का उपाय जीन इंजिनिरिंग से सुधारी गई फसलें ही हो सकती हैं। ये फसलें प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने में अधिक सक्षम हैं। जीएम फसलों की क्षमता तब एक बार फिर उजागर हुई जब एक चीनी अध्ययन में कीट-प्रतिरोधी जीएम चावल की किस्म में 10 फीसदी की  बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई।

मेरा खयाल है कि यह सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का ही मामला नहीं  है,  बल्कि यह कीटनाशकों के अत्यधिक हो रहे प्रयोग को नियत्रित करने में भी  सहायक होगा। चीन में ऐसे कीट प्रतिरोधी क़िस्में उगाने वाले किसानों में कीटनाशकों से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में नाटकीय सुधार देखा गया है।

हरित क्रांति के तहत भारत में वैसे तो1983 से ही चावल के भी संकर बीज उपलब्ध थेलेकिन 1987 में हरित क्रांति के दूसरे चरण से शुरूआत बड़े स्तर पर की गई। इसमें 'अधिक चावल उपजाओ'  कार्यक्रम को प्रधानता दी गई। हरित क्रांति के इस दूसरे चरण में 14 राज्यों के 169 ज़िलों का चुनाव किया गया। संकर बीजों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए 169 में से 108 ज़िलों में चावल क्रांति को प्राथमिकता दी गई। दरअसलइनमें हरियाणा के 7 और पंजाब के 3 ज़िले भी शामिल हैंजिन्हें परंपरागत तौर पर गेहूं उत्पादक माना जाता था।  दूसरे प्रमुख राज्यों में से मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) के 30, उत्तरप्रदेश-उत्तरांचल के 38बिहार के 18,राजस्थान के 14 और महाराष्ट्र के 12 ज़िले शामिल थे।

दूसरे चरण की हरित क्रांति का ही परिणाम है कि भारत आज खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) को खाद्यान्न दान करने दूसरा सबसे बड़ा देश है।

चवाल के जीनोम की सिक्वेंसिंग इंटरनेशनल राइस जीनोम सिक्वेंसिंग प्रोजेक्ट ने की है। इसका डाटाबेस भारत समेत जापानचीन ताईवानकोरियाथाईलैंडअमेरिकाकना़डाफ्रांसब्राजीलब्रिटेन और फिलीपीन्स के वैज्ञानिकों के लिए निशुल्क उपलब्ध है। ज़ाहिर हैयहां भूमंडलीकरण के सकारात्मक पहलू सामने आए हैं।दुनिया में करीब 120 करोड़ लोग रोजाना एक डॉलर से भी कम पर गुजारा करते है। ऐसे में रोगपेस्टसूखा और लवणता प्रतिरोधी धान की फसल तीसरी दुनिया के कृषि परिदृश्य में क्रांति ला सकती है जाहिर हैयह भूखों के हित में होगा।

Wednesday, September 29, 2010

Where are non-political leaders, history will certainly grill them for Ayodhya !


Sushant Jha
( Writer is a Delhi based journalist and ex-student of IIMC)
The verdict on Ayodhya dispute is scheduled to come tomorrow but any ruling of the court is certainly to be challenged in Supreme Court by either side that looses it. The political leadership in this country has failed to resolve this issue since independence. But we are surprised to see the calculated silence of leaders in other field. Though, Ayodhya dispute no longer seems much explosive as it happened to be in late 80s or early 90s, but it has immense hidden capacity to inflame the whole nation given its sensitivity. 
Ex Prez. Abdul Kalaam
Unfortunately, we don’t have leaders like Mahatma Gandhi or Dr. Ambedkar who once solved the Dalit issue amicably and whole nation accepted it. Those days were not the days of information or literacy; even then the feudal and Brahminical Hindu society accepted what Gandhi promised Ambedkar in that talk. Again, the second issue of socio-politico nature was that of OBC reservation which was peacefully (amid some disturbance in north India) solved by Parliament and the Supreme Court. But today, there is a dearth of such mass leaders and complete lack of political consensus that we can even come to any amicable conclusion vis-à-vis this dispute.
Sri Sri Ravi Shanker
But sometimes I feel that some people in our country are surely respected for their work and integrity in every community and show non-partisan attitude towards issues. Why they don’t come out and sit together to contribute their moral authority? We have Dr Kalam, Sri Sri Ravishankar, Gulzar, Narayan Murthy and Ratan Tata who might contribute and prove more useful in this painful event of history. Some may raise a question that they might be titans in their respective fields but they will prove a disaster in this dispute. But I will suggest that we have tried everything, our political class, our religious leaders and even our judiciary for that sake for more than half century. So why not have a bet on leaders of other sector, who are more acceptable to people?
Secondly, these leaders will have chance to taste their real moral authority across the masses. There is huge opportunity hidden in this dispute, a person or a group of persons who comes to even a distant solution of this problem, will be a second Gandhi in this country.
And if they shy away in this crucial juncture as they are doing now, history will certainly ask them the unpleasant question; what were you doing when the whole country was troubled and life of over a billion people were in constant tension?  Is it not a similar case of Nero playing flute while Rome burnt?