Saturday, November 13, 2010

फ्रॉम वॉशिंगटन-टू-काबुल वाया नई दिल्ली

राजीव कुमार 
(लेखक आईआईएमसीनयी दिल्ली के पूर्व छात्र और टीवी टुडे ग्रुप (हेडलाईंस टुडे) में कार्यरत हैं)
बराक ओबामा जा चुके हैं। जाते-जाते वो हमारे कानों को वो बातें सुना गए जिसे सुनने के लिए हम कब से बेकरार थे। लेकिन शोर-शराबा खत्म होने के बाद अब वक्त आ गया है जब हम गिफ्ट बॉक्स को खोलें और देखें कि जो आश्वासन मिला, वो हमारे कितने काम का है ? सबसे पहले बात सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की।  ओबामा और उनके सलाहकार जानते है कि भारत के लिए स्थाई सीट का रास्ता काफी लंबा है और मुश्किल भरा भी। सिर्फ अमेरिका के समर्थन से कुछ नहीं होगा। मान लीजिए चीन तैयार भी हो जाता है तो जापान,  जर्मनी,  दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील का क्या होगा? जिनका दावा भारत से कम मजबूत तो नहीं है। ये देश भारत को रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं बशर्ते इन्हें भी स्थाई सीट मिले।


आसान नहीं होगी सुरक्षा परिषद की राह 
अगर भारत से रिश्तों के प्रति अमेरिका सचमुच गंभीर है तो उसे हमारी अफगानिस्तान सम्बन्धी चिंताओं पर ज्यादा गौर करना चाहिए था। भारतीय सांसदों को संबोधित करते हुए अगर ओबामा कहते कि अब से वाशिंगटन अपनी अफगान नीति और फ़ैसलों में भारत को पाकिस्तान से कम तवज्जो नहीं देगा”, तो ये बात सुरक्षा परिषद के लॉलीपाप से बेहतर और ज्यादा मुक़म्मल होती। अफगानिस्तान से हमारा रिश्ता पाकिस्तान से कहीं कमतर नहीं रहा है। ऑपरेशन एनड्युरिंग फ्रीडम की शुरुआत से ही भारत करज़ई सरकार को हर तरह से मदद देता आ रहा है। वो चाहे अफगानिस्तान को फिर से खड़ा करने के लिए बुनियादी जरूरतों का सामान हो  या फिर पेट भरने के लिए खाना।

रूस के साथ बन सकती है अफगानिस्तान में बात 
अफगानिस्तान में अमेरिका तालिबान से युद्ध लड़ रहा है और इस लड़ाई को जीतने के लिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिकी ड्रोन से मारे गए हर एक तलिबानी की जगह लेने के लिए अल-कायदा और आयमान-अल-जवाहिरी भस्मासुर की तरह सैकड़ों लड़ाकों को खड़ा कर देते हैं। अफगानिस्तान में अमेरिका बुरी तरह फंस चुका है और इस लड़ाई का अंत दूर-दूर तक नहीं दिखता है। वो यह भी जानता है कि आतंकी संगठनों का मुख्यालय पाकिस्तानी सीमा के अंदर फाटा क्षेत्र में है,  जहां से इनके आका इनको संचालित कर रहे हैं। इन आतंकी संगठनों को आईएसआई से मिल रहे खुले समर्थन की बात भी अमेरिका से छिपी नहीं है।

विकास के लिए शान्ति चाहिए 
पाकिस्तान का यह दोहरा खेल तब तक चलेगा जब तक उसे लगता रहेगा कि अमेरिका के पास पाकिस्तान के साथ और उसकी शर्तों पर काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ज़रदारी सरकार,  ख़ासकर पाकिस्तानी सेना को जिस दिन अंदाजा हो जाएगा कि अब अमेरिका, पाकिस्तान के बिना भी अफगानिस्तान में जंग जीत सकता है उसी दिन आईएसएआई पर लगाम लग जाएगी और अमेरिका के लिए अफगानिस्तान में रास्ता आसान हो जाएग। भारत वहाँ अमेरिका के लिए अच्छा विकल्प मुहैया कराता है। कोल्ड वार के दौर से बाहर निकलकर अमेरिका को रशिया (रूस) से भी बात करनी चाहिए। भारत-रूस को साथ लेकर अमेरिका निश्चित रूप से ये जंग जीत सकता है। मुझे नहीं लगता कि रूस मौजूदा हालात में अमेरिका का साथ देने को तैयार नहीं होगा।

पाकिस्तान को ही निगल लेगा तालिबान 
कुछ विशेषज्ञों की राय हो सकती है कि इसके बाद पाकिस्तान ड्रोन को अपनी सीमा के अंदर घुसने से रोक सकता है और यहां तक कि खुलकर तालिबान के समर्थन में आ सकता है। जब पाकिस्तान, तालिबान की पुरानी तकनीक का मुकाबला नहीं कर सकता,  तब ड्रोन की उन्नत तकनीक से मुकाबला पाकिस्तान के वश की बात नहीं है। जहां तक तलिबान के समर्थन में खुल कर आने की बात है,  पाकिस्तान को इसके खतरे का पूरा एहसास है। अभी कुछ महीनों पहले ही तालिबान राजधानी इस्लामाबाद से सिर्फ 60  किलोमीटर दूर बुनेर तक आ पहुंचे थे। पाकिस्तान के पसीने छूटने लगे थे। इस घटना की याद अभी तक वहां के हुक्मरानों को होगी।


ऐसे में ओबामा प्रशासन अगर भारत से रिश्तों के प्रति सचमुच गंभीर है तो दिसंबर में होने वाली अपनी अफगानिस्तान समीक्षा बैठक में भारत के अफगानिस्तान में रोल पर फिर से गौर करेगा। अमेरिका अगर इस समीक्षा बैठक में पाकिस्तान को साफ-साफ संदेश देने में सफ़ल हो जाता है तो अफगानिस्तान में उसके लिए चीज़ें काफी आसान हो सकती हैं।

Friday, November 12, 2010

हांफती खबरें, सांस लेती जिंदगी.... न्यूज़ रूम के फाइव फिटनेस मंत्र

धीरज वशिष्ठ 
(लेखक आईआईएमसी नई दिल्ली के पूर्व छात्र, योग इंस्ट्रक्टर और स्वतंत्र पत्रकार हैं)
दिल्ली से सटे नोएडा में फिल्म सिटी। हिंदी-अंग्रेजी के तमाम न्यूज़ चैनलों के दफ्तर। दफ्तर के बाहर महंगी-महंगी कारें और भीतर चमचमाती रोशनी में नहाता न्यूज़ रूम। न्यूज़ रूम में एकबारगी नजर दौड़ाएं तो सबकुछ ठीक नज़र आता है। हर कोई अपने काम में मशगूल, अपनी स्टोरी में व्यस्त। आखिर हो भी क्यों नहीं? राष्ट्रीय चैनल के मेन दफ्तर में काम, मोटी तनख्वाह और नेम-फेम कोई साधारण बात तो नहीं  होती।

चैनल की तरह राष्ट्रीय अख़बारों के दफ्तरों का भी कमोबेश यहीं हाल है। चाहे चैनल हो या अखबार या वेबन्यूज़ की दुनिया। एक बात जो सभी में समान है वो है, गलाकाट प्रतिस्पर्धा। पहले खबरों को पेश करने की चुनौती। तेज़....तेज़...और भी तेज़..। लेकिन रफ्तार पर सवार खबरों की इस दुनिया ने एक नई परेशानी खड़ी कर दी है, जिससे हर दिन मीडियाकर्मी दो-चार हो रहें हैं। जी हां.. तनाव।

गुस्सैल बना रहा तनाव 
ग्लैमर, नेफ-फेम की चकाचौंध दुनिया ने मीडियाकर्मियों को तनाव का बोनस भी दिया है। स्टोरी का जुगाड़ करना, सबसे पहले खबरों को ब्रेक करने की छटपटाहट और इन सबसे बढ़कर टीआरपी का साप्ताहिक राक्षस। ये वो तमाम चीज़ें है जिसने मीडियाकर्मियों की जिंदगी को तनावयुक्त कर दिया है। हम चाहें या ना चाहें तनाव जिंदगी का हिस्सा बन गया है। ऐसे में सवाल है कि गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच, सबसे पहले और सबसे तेज की भागदौड़ के बीच, हम मीडियाकर्मी या हर वो कोई जिसके ऑफिस में भागमभाग है, अपने को तनाव से कैसे दूर रखें ?

इस यक्ष प्रश्न का जवाब भी सदियों पुरानी योग पद्धति में छुपा है। फ़िल्मी दुनिया के बाद अब न्यूज़ की दुनिया से सरोकार रखने वाले लोग भी तेजी से योग की शरण में आ रहे हैं। आखिर सवाल तनाव से बचने का है, भागदौड़ के बीच अपने को फिट रखने का है। 24*7 कॉन्सेप्ट के बीच अपने को तरोताज़ा रखने का है।

योग पद्धति अपनाकर आप खुद को ऑफिस के किसी भी वातावरण में ढाल सकेंगे। इसके लिए यहां ना तो मैं आपको कोई भारी-भरकम आसन बताने जा रहा हूं, न ही बाबा रामदेव की तरह नौली ( पेट की मांसपेशियों को घुमाने की प्रक्रिया) करने की सलाह दे रहा हूं। बस कुछ आसान यौगिक टेक्निक, ऐसी टेक्निक जिसे आप ऑफिस में बैठे-बैठे भी कर सकते हैं। इसे अपनाएं और टेंशन को कहें अलविदा।
   
नुस्खा नंबर - 1 

ऑफिस में रखिये ऑफिस का टेंशन 
क्या करें -
कुर्सी पर कमर को सीधी करके बैठ जाएं। दोनों पांव को कम्फरटेबल तरीके से रखें। कंधे को रिलेक्स और चेहरे की मांसपेशियां ढीली करें। अब आंखों को बंद करें और ध्यान सांसों पर लगाएं।

कब करें -
जब भी आपको तनाव या थकावट महसूस हो।

लाभ -
सांसों पर ध्यान केंद्रित करते ही आप खुद को हल्का महसूस करेंगे।

नुस्खा नंबर - 2

क्या करें -
पहले की तरह स्थिति में आएं, आखों को बंद करें। अब मन में चल रहें विचारों को ऑब्जर्ब करें। विचार किसी भी प्रकार के हो सकते हैं, अच्छे या बुरे। आप सिर्फ ऑब्जर्ब करें, रिएक्ट नहीं।

कब करें -
जब किसी बात को लेकर उलझन बढ़ी हो। ऑफिस में साथियों से तू-तू-मैं-मैं हो जाए या फिर बॉस ने जमकर डांट पिलाई हो।

लाभ -
आप जिन बातों को लेकर परेशान और गुस्से में थे, वो बातें मन से दूर होने लगेंगी और आप खुद को रिलैक्स्ड पाएंगे।

नुस्खा नंबर - 3

क्या करें -
पहले वाली स्थिति में आएं। अब लंबी-गहरी सांस लेते हुए पेट फुलाएं और फिर सांस छोड़ते हुए पेट को अंदर की ओर जाने दें। सांसों के साथ पेट के अंदर-बाहर होने की क्रिया पर तालमेल बनाएं रखें।  
   
कब करें -
थकावट बढ़ी हुई हो, सिर भारी लग रहा हो।

लाभ -
प्राणिक फ्लो सही होने से आप स्वयं को ज्यादा ऊर्जावान पाएंगें।

नुस्खा नंबर - 4

क्या करें -
कुर्सी पर कमर को सीधी करके बैठें। अब हाथों की ऊंगलियों को एक-दूसरे से फंसाएं। सांस लेते हुए हाथों के साथ पूरे शरीर को ऊपर की ओर खींचें। कुछ देर रुकें, सांस छोड़ते हुए वापस आएं। तीन बार इस प्रक्रिया को दोहराएं।

कब करें -  
ऑफिस में लंच या डिनर लेने से पहले।

लाभ -
मांसपेशियों का टेंशन अलविदा कहेगा और आप तनाव मुक्त होंगे।

नुस्खा नंबर - 5

क्या करें -
हलके योग से हो जायेंगे ' कूल '
कमर सीधी करें। अब लंबी-गहरी सांस लें। सांस छोड़ते हुए शरीर को अपनी दाहिने ओर ट्विस्ट करें। कुर्सी को पीछे पकड़कर आप शरीर को बेहतर ट्विस्ट कर सकते हैं। ट्विस्टिंग की ये क्रिया बांई ओर भी दोहराएं।

कब करें -
ऑफिस में लंच या डिनर लेने से पहले। खाने के बाद ये क्रिया बिल्कुल ना करें।

लाभ -
पाचन क्रिया एक्टिव रहेगी और गैस-जलन जैसी तकलीफों से निजात।



इसके अलावा आप अपनी गर्दन, कलाइयों, कंधों आदि भागों को दिन में कम से कम एकबार थोड़ी-बहुत सावधानी से मूवमेंट ज़रूर दें। इन तमाम प्रक्रियाओं को अपनाकर आप शारीरिक और मानसिक तनाव से दूर रह सकते हैं। आपकी प्रोडक्टिविटी बढ़ने का लाभ आप के साथ आपकी कंपनी को भी मिलेगा। तो फिर सोचते क्या हैं..अरे भाई कुछ नहीं तो सिर्फ आंखों को बंद कर अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करके तो देखें।  

Thursday, November 11, 2010

यूपी फिर बेदम, कम जुर्म का भ्रम

लगता है यूपी वालों की किस्मत ही फूटी है। पिछले 20 सालों में जिसे भी कुर्सी सौंपी, उसने चूसा और अपराधियों ने जमकर लूटा। बीते सालों में एक-दो बड़े अपराधियों और कुछ मोहल्लाछाप बदमाशों को मार गिराने के अलावा यूपी पुलिस के पास खुश होने का कोई मौका नहीं है। 2005 के पहले वाले बिहार की तरह अब यूपी में भी फिरौती के लिए अपहरण का धंधा चल निकला है। 1 जनवरी से 30 सितंबर, 2010 के बीच प्रदेश में 50 अपहरण हुए। 2009 से 25 फीसदी ज्यादा। लूट की वारदातें भी 15 फीसदी तक बढ़ी हैं। ये कोई विपक्षी पार्टी नहीं कह रही बल्कि यूपी पुलिस का क्राइम रिकॉर्ड है।

अपराधों से थर्रा रहा सूबा 
याद करिये 2006-07 का वो वक्त जब अमिताभ बच्चन यूपी के ब्रांड एबेंसेंडर और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। टीवी, अख़बारों और सड़कों पर लगी होर्डिंग में अमिताभ एक ही बात कहते थे...यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम। उस समय भी यूपी में लॉ एंड आर्डर की हालत बेहद खराब थी। कांग्रेस,  बसपा और भाजपा ने जमकर शोर मचाया था। विपक्षी दलों ने अमिताभ की एक लाइन के आगे अपनी एक लाइन और जोड़ी...झूठ यहां है ज्यादा सच्चाई बिल्कुल कम। मुलायम सिंह की सरकार को 2007 में पब्लिक ने चलता कर दिया। कुर्सी संभाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने। वैसे तो मायावती बेहद कड़क मिज़ाज के लिए जानी जाती हैं लेकिन 2008 आते-आते उनकी अफसरों पर पकड़ खत्म सी हो गई। शुरुआत में तो मायावती ने दम दिखाया। इलाहाबाद में अतीक अहमद की बिल्डिंग पर हथौड़े चलवा दिए। पुलिस शातिर अपराधियों के एनकाउंटर के मूड में आ गई लेकिन ये सब ज्यादा दिन नहीं चला। सुधार के नाम पर गांव से लेकर शहर तक कई बड़े क्रिमिनल बसपा में शामिल हो गए। अब तो गुंडों के मन में डर खत्म हो गया था।

अक्सर होता पुलिस-पब्लिक में बवाल 
2005 में नीतीश कुमार के सत्ता संभालने के पहले बिहार बहुत बदनाम था। सबसे बड़ी वजह थी,  अपहरण का धंधा। बिहार पुलिस ने जमकर सख्ती की। नतीजा,  कुछेक वारदातों को छोड़कर अपहरण का धंधा बंद हो गया। बिहार के लोगों को अकसर बिहार के बाहर लॉ एंड आर्डर के मसले पर काफी कुछ सुनने को मिलता था। अब बारी यूपी वालों की है। 10 नवंबर को यूपी पुलिस ने अपराध के ताज़ा आंकड़ें जारी किए हैं। जो भी यूपी की घटनाओं को फॉलो करता है,  इसे देखकर उसका सिर चकरा जाएगा। इस साल 1 जनवरी से 30 सितंबर के बीच यूपी में फिरौती के लिए अपहरण,  डकैती और लूट की घटनाओं में इज़ाफा हुआ है। इस पीरियड में 50 अपहरण हुए तो 127 डकैतियां और 1545 लूट की वारदातें। 2009 में अपहरण 40 थे, डकैतियां 122  और लूट की घटनाएं 1336। ये आंकड़ें ऎसे तब हैं जब यूपी पुलिस एफआईआर लिखती ही नहीं है। कहानी यहां खत्म नहीं होती है। इन नौ महीनों में 3123 हत्याएं,  2913 चोरियां हुईं। औरतों के खिलाफ तो जैसे अपराधियों को खुली छूट मिल गई है। 1025 बलात्कार और 1619 दहेज हत्याएं पुलिस की काहिली बता रहे हैं। डकैती, लूट और अपहरण के अलावा बाकी अपराधों में यूपी पुलिस कमी का दावा कर रही है। वो इसलिए कि यूपी पुलिस की एक आदत है। डकैती को चोरी और अपहरण को गुमशुदगी में दर्ज करना। बलात्कार, लूट और लड़कियों से छेड़खानी जैसे मामलों को तो उत्तर प्रदेश में पुलिस झूठा साबित कर देती है। एफआईआर तो दूर की कौड़ी है। हिम्मत है तो अपने साथ हुए किसी अपराध की आप उत्तर प्रदेश के किसी भी थाने में रिपोर्ट लिखाकर दिखाइए।
  
जनता की नहीं सरकारी सेवक बन गयी यूपी पुलिस 
पूर्व, पश्चिम और मध्य यूपी में तो जैसे अपराधों की बाढ़ सी आ गई है। वेस्ट यूपी में डिसआनर किलिंग, अपहरण, बलात्कार और लोगों को सरेआम गोलियों से भूनने की घटनाएं आम हैं। एनसीआर का हिस्सा नोएडा भी इससे अलग नहीं है। बीते महीनों में कैराना और मेरठ जैसी जगहों पर तो सरेआम कारोबारियों को गोली मार दी गई। गुस्साए लोगों ने चौकियां फूंक दी, बसें जला दीं लेकिन अपराधी हाथ नहीं लगे। सेंट्रल यूपी में तो बच्चियों और औरतों की शामत आई हुई है। कानपुर का दिव्या कांड,  नीलम कांड अभी ठंडा नहीं पड़ा है। कई मामलों में तो पुलिस ने झूठा वर्कआउट किया और शाबाशी ले ली। नवंबर 2009 में उन्नाव में एक पूरे परिवार की हत्या कर दी गयी। आज तक क़ातिलों को पुलिस नहीं पकड़ सकी। गांव वाले दबी ज़ुबान से हत्यारों का नाम बताते हैं। सितंबर 2010 में रायबरेली में एक नौजवान के सरेआम हाथ-पैर काट दिए गए। दबंग थाने में बैठे थे और सड़क पर खूनी खेल चल रहा था मुख्यमंत्री को भी ये पता है लेकिन कुछ नहीं हुआ। पूर्वांचल में भी संगठित अपराध अब थामे नहीं थम रहा। पूरे प्रदेश में गुंडाटैक्स (रंगदारी) वसूलने का काम फिर से शुरू हो गया है। हत्या की वारदातें बढ़ी हैं। पंचायत चुनावों में तो इतना खूनखराबा हुआ कि 2005 के पहले वाले बिहार के जानकार भी चकरा गए।

इन सबके बीच सबसे ख़राब बात ये है कि सरकार और जनता के बीच दूरियां लगातार बढ़ रही हैं। 2007 में कुर्सी संभालने के बाद मुख्यमंत्री मायावती शायद ही कभी किसी गांव-शहर के दौरे पर जाती हों। चौकस पुलिसिंग के लिए बड़े शहरों में एसएसपी के पद पर डीआईजी रैंक के अफसर मुख्यमंत्री ने बैठा रखे हैं। आईएएस-आईपीएस बेलगाम हैं। अफसर कुर्सी संभालते नहीं कि तबादले के दूसरे आदेश आ जाते हैं। बड़े शहरों में डीआईजी/एसएसपी का औसत कार्यकाल 4 महीने का हो गया है। लोगों को भी पुलिस अब नहीं सुहाती,  भरोसा जो उठ गया। आये दिन पुलिस-पब्लिक में झड़पें होती हैं। पुलिस निहत्थों पर लाठी-गोली चलाती है। बेसिक पुलिसिंग के फंडे अब यूपी में नहीं दिखते। अब आगे क्या होगा ? आइए हम भारतवासी यूपी में खुशहाली और शान्ति की दुआ करें...आमीन !
(लेखक प्रवीन मोहता आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं)

Wednesday, November 10, 2010

बॉलीवुड : हर दौर में बदला हीरोइन का हीरो

मंजीत ठाकुर 
(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र और डीडी न्यूज़ में वरिठ संवाददाता हैं )
भारत में सिनेमा जब शुरू हुआ तो फिल्में मूल रूप से पौराणिक आख्यानों पर आधारित हुआ करती थीं। लिहाजा, हमारे नायक भी हरिश्चंद्र, राम या विष्णु के किरदारों में आते थे।

पहली बोलती फिल्म आलम आरा’ (1931)  के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश परिपाटियाँ  तय हो चुकी थीं लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तो अभिनेताओं के चेहरों और देह-भाषा (बॉडी लैंग्वेज ) के साथ अभिनय में गले और स्वर की अहमियत बढ़ गई। 1940 का दशक हिंदी सिनेमा का एक संक्रमण-युग था। वह सहगल,  पृथ्वीराज कपूर,  सोहराब मोदी,  जयराजप्रेम अदीब,  किशोर साहूमोतीलाल,  अशोक कुमार सरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकों  का ज़माना था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार,  देव आनंद,  किशोर कुमार और भारत भूषण जैसे नए लोग  दस्तक दे रहे थे।

पृथ्वीराज कपूर 
पारसी   और बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीय  शैलियां बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं । उधर बरुआ ने बांग्ला  ‘देवदास’  में नायक की परिभाषा को बदल दिया। अचानक सहगल  और सोहराब मोदी जैसे स्थापित नायक अभिनय-शैली में बदलाव की  वजह से भी पुराने पड़ने लगे। मोतीलाल और अशोक कुमार पुराने और नए अभिनय के बीच की दो अहम कड़ियाँ हैं। इन दोनों में मोतीलाल सहज-स्वाभाविक अभिनय करने में बाज़ी मार ले जाते हैं। लेकिन कलकत्ता में लगातार तीन साल चलने वाली क़िस्मत’  में प्रतिनायक के किरदार में अशोक  कुमार एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे।

अशोक कुमार 
आजा़दी के आसपास ही परदे पर देवानंदराजकपूर और दिलीप कुमार सितारे की तरह उगे। दिलीप कुमारनुमा  रोमांस का मतलब था ट्रैजिक रोमांस। दिलीप कुमाररोमांस हो या भक्ति,  मूल रूप से अपनी अदाकारी को केंद्र में रखते थे और वे ट्रेजिडी किंग के नाम से मशहूर भी हो गए। दिलीप कुमार ने अभिनय की हदें बदल डालीं।

आजादी  के बाद के युवाओं में रोमांस का पुट भरा देवानंद ने। देवानंद कॉलेज के  लड़कों में,  एडोलेसेंट लेवल पर काफी लोकप्रिय थे। देव  आनंद हॉलीवुड के बड़े नायक ग्रेगरी पेक से प्रभावित तो हुए लेकिन पेक की कुछ अदाओं को छोड़कर उन्होंने उनसे अच्छा अभिनय  कभी नहीं सीखा जो पेक की रोमन हॉलिडे’, ‘टु किल ए मॉकिंग बर्ड’ या दि गांस ऑफ़ नावारोने’ में दिखाई देता है।

मन को गुदगुदाते रहे देव आनंद 
एक मज़ेदार प्लेब्वॉय बनकर ही रह गए देवानंद की लोकप्रियता कई बार दिलीप कुमार और राजकपूर से ज़्यादा साबित हुई। इस तिकड़ी में देव ही ऐसे थे जिनकी नकल करोड़ों दर्शकों ने की लेकिन उनके किसी समकालीन ने उसकी नकल करने की ज़ुर्रत नहीं की।

राज कपूर एक अच्छे अभिनेता तो थे ही लेकिन उससे भी बड़े  निर्देशक थे। अपनी फिल्मों में अदाकार के तौर पर उन्होंने हमेशा आम आदमी को  उभारने की कोशिश की। आरके लक्ष्मण के आम आदमी की तरह के चरित्र उन्होने सिल्वर स्क्रीन पर साकार करने की कोशिश की। राज कपूर,  दिलीप कुमार और देवानंद,  ये तीनों एक  स्टाइल आइकॉन थे। लेकिन  इन तीनों का जादू तब चुकने लगा, जब एक किस्म का रियैलिटी चेक (जांच) जिदंगी में आया।

बलराज साहनी 
इस तिकडी़ के शबाब के दिनों में ही बलराज साहनी ने दो बीघा ज़मीन के  ज़रिए मार्क्सवादी विचारों को सिनेमाई स्वर दिए। दो बीघा ज़मीन उस ज़माने की पहली फिल्म थी,  जिसमें इटालियन नव-यथार्थवाद की झलक तो थी हीइसका कारोबार भी उम्दा रहा था।

फिल्म में बेदखल सीमांत किसान की भूमिका को बलराज ने जीवंत कर  दिया था। बेहद हैंडसमरहे साहनी  हिंदी सिनेमा के पहले ‘असली’ किसान-मज़दूर के रूप में पहचाने गए। दरअसल, अभिनय के मामले में अपने समकालीनों से बीस ही रहे साहनी, ओम पुरी, नसीर और इरफान के पूर्वज ठहरते हैं।
स्टाइल आइकॉन रहे दिलीप कुमार 

गुरुदत्त बेहद निजी किस्म की फिल्में बनाते थे लेकिन उनका दायरा बेहद सार्वजनिक होता था। गुरुदत्त ने परदे पर एक अलग  तरीके के नायक की रचना की। काग़ज़ के फूल के नायक ने दुनिया के बेगानेपन पर अपनी तल्ख़ टिप्पणी छोड़ी।

इसी दशक में मदर इंडिया भी आई। परदे पर विद्रोह और आदर्शवाद साथ दिखा। भारत माता के रूप में उकेरी गई नरगिस ने अपने ही  डकैत बेटे को गोली मारकर आदर्शवाद की नई छवि गढ़ दी। लेकिन दर्शकों का एक ऐसा वर्ग तैयार होना शुरू हो चुका थाजिसकी सहानुभूति  डकैत बेटे सुनील दत्त से थी। उधर अभिनय-शैली के मामले शुरू में एल्विस प्रेस्ले से प्रभावित शम्मी कपूर ने बाद में खुद की ' जंगली '  शैली विकसित की । इसका गहरा असर जितेंद्र,  मिथुन चक्रवर्ती वगैरह से होता हुआ गोविंदा तक आता है। यह संकोचहीन नाच-गाने का पॉपुलर कल्चर है।

सबसे जुदा राजेश खन्ना 
1969 में को शक्ति सामंत की ब्लॉकबस्टर आराधना ने रोमांस के एक नए नायक को जन्म दिया, जो पूछ रहा थामेरे सपनों की रानी कब आएगी तू....” इस के साथ ही हिंदी  सिनेमा में सुपरस्टारडम की शुरुआत हुई। राजेश खन्ना, दिलीप कुमार की परंपरा में थे और रोमांटिक किरदारों में नजर आते रहे। किशोर कुमार की आवाज़ गीतों के लिए परदे पर राजेश खन्ना की आवाज़ बन गई और इसने राजेश खन्ना को एक ' मैटिनी आइडल ' बना दिया।  परदे पर पेड़ों के  चारों तरफ नाच-गाने लोगों को दुनियावी मुश्किलों से कुछ देर के लिए तो दूर कर देते थे लेकिन समाज परदे पर परीकथाओं  जैसी प्रेमकहानियों को देखकर कसमसा रहा था।

नए दौर का नायक अमिताभ 
ज़ाहिर हैसिनेमा का एक बेहद प्रचलित मुहावरा ' विलिंग  सस्पेंन ऑफ़ डिसबिलीफ '  सच होता दिख रहा था। लेकिन तभी परदे पर रोमांस की नाकाम कोशिशों के बाद फिल्म जंज़ीर में एक बाग़ी तेवर की धमक दिखीजिसे लोगों ने अमिताभ बच्चन के नाम से जाना। गुस्सैल निगाहों को बेचैन हाव-भाव और संजीदा-विद्रोही आवाज़ ने नई देहभाषा दी। और उस वक्त जब देश जमाखोरी,  कालाबाज़ारी और ठेकेदारों-साहूकारों के गठजोड़ तले पिस रहा था,  बच्चन ने जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के ज़रिए नौजवानों के गुस्से को परदे पर साकार कर दिया। विजय नाम का यह नौजवान इंसाफ के लिए लड़ रहा था  और उसे न्याय नहीं मिले तो वह अकेला मैदान में कूद पड़ता था।

कककक...किरन यानी शाहरुख  
लेकिन बदलते वक्त के साथ इस नौजवान के चरित्र में भी बदलाव आया। जंजीर में उसूलों  के लिए सब-इंसपेक्टरी छोड़ देने वाला नौजवान देव तक अधेड़ हो जाता है। देव में इसी नौजवान के पुलिस कमिश्नर बनते ही उसूल बदल जाते हैं  और वह समझौतावादी हो जाता है।


90 के दशक की शुरुआत में अमिताभ बच्चन का गुस्सैल नौजवान अप्रासंगिक होता दिखा। 90 के  दशक में भारत बदलानई नीतियां आ गईं और तरक्की की ओर जाने के रास्ते बदल गएतो बाग़ी तेवरों के लिए दर्शकों के लिए जो अपील थीवो ख़त्म होने लगी।


अर्थपूर्ण एक्टर आमिर खान 
रेग्युलराइज़ेशन होने लगा तो नए हिंदुस्तान को दिखाने के लिए सिनेमा में नए चेहरों की ज़रुरत पड़ी। इस मौके को वैश्विक भारतीय बने राज मल्होत्रा यानी शाहरुख ख़ान ने थाम लिया। इनका किरदार नौकरी के लिए कतार में नहीं लगता उसे भूख की चिंता नहीं है, वह एनआरआई  है  और अपने प्यार को पाने लंदन से पंजाब के गांव तक आ जाता है।

आमिर में शाहरुख़ जैसी अपील तो नही है लेकिन वह अदाकारी में शाहरुख़ से कई क़दम आगे हैं। शाहरुख़ तड़क-भड़क में आगे हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों में मैथड एक्टिंग के ज़रिए  आमिर,  शाहरुख़ के जादू पर काबू पा लेते हैं। एक तरह से आमिर मिडिल सिनेमा में मील के पत्थर है तो शाहरुख सुपर सितारे की परंपरा के वाहक।