Sunday, December 5, 2010

अब प्यार को मिल गईँ आंखें

विवेक आनंद 
(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं)
बड़ी पुरानी कहावत है  कुछ पुराने प्रेमची कह गए हैं प्यार अंधा होता है कब, कहां, किससे हो जाए, कहा नहीं जा सकता बस दिल में एक हूक सी उठती है और सबकुछ धुआं-धुआं सा हो जाता है फिर कुछ दिखाई नहीं देता महबूब आड़ा-तिरछा कैसा भी हो... दुनिया में सबसे खूबसूरत दिखता है। आंखें भैंगी ही क्यों ना हो... लेकिन वही झील सी दिखती है बस उसी में डूब जाने को दिल करता है बॉबकट वाली बाला क्यों ना हो, उसके वही गेसू आसमान की काली घटा से दिखते हैं पुराने प्रेमची कह गए हैं कि दिल लगी दीवार से तो परी क्या करे’ लेकिन हकीकत में ऐसा होता है क्या?


पुराने प्रेमचियों की कही बात पर भरोसा नहीं होता ऐसा होता कहां है? मुझे तो इसमें शक है मुझे तो लगता है कि प्यार बड़ा सोच समझकर किया जाता है, अच्छी तरह से आंखें खोलकर, देखभाल कर किया जाता है दीवार से दिल नहीं लगता, दिल तो परी पर ही आता है मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस तो यही कहता है अब अगर किसी को मेरे प्यार पर शक हो तो ये अलग बात है लेकिन सच्चे दिल से मैं इतना दावा तो कर ही सकता हूं कि मेरा प्यार भी 100 फीसदी डबल फिल्टर्ड प्यार था लेकिन कमबख्त ने उस प्य़ार की वैल्यू ही नहीं समझी शायद उसने भी मेरी तरह आंखें खोल रखी थीं अब परी को भी तो कोई कॉम्पिटेंट आइटम चाहिए


बिन पैसे हम न होंगे तेरे !!!
मेरा पर्सनल एक्सपीरियंस कहता है कि मैं चाहे कितना भी बदसूरत रहा हूं, मैंने हमेशा परी टाइप आइटम ही ढूंढ़ी, आंखें खोलकर जो प्यार किया था ये अलग बात है कि उस वक्त मैं पुराने प्रेमचियों  की कही बात की दुहाई ही दिया करता था... जैसे, प्यार कैसे हुआ... कब हुआ... पता ही नहीं चला... बस लगा कि यही है मेरे लिए परफेक्ट आइटम... और फिर आंखों में ख्वाब तैरने लगे... कि बस, अब तो इसके अलावा किसी और को देखूंगा भी नहीं... लेकिन ये कहां पता था कि वो भी अपने लिए परफेक्ट आइटम ढूंढ़ रही थी


वो मेरे साथ ही पढ़ती थी कुछ मजबूरियों की वजह से हम करीब आए और मुझे प्यार हो गया परी से कम नहीं थी वो, आंखें खुली रखकर जो प्यार किया था इसलिए दीवार से दिल लगाने का चांस ही नहीं था हमने साथ-साथ वक्त गुजारा, लंबे अरसे तक साथ रहे, लगा कि पब्लिकली वी आर द बेस्ट फ्रेंड्सकहना तो लड़कियों की आदत होती है मामला तो जम ही जाएगा लेकिन जब लगा कि अब काफी वक्त हो चुका है और अब तो इज़हार-ए-मोहब्बत के बिना काम नहीं चलने वाला तो मामला ही उल्टा हो गया फिर तो सारा प्यार हवा-हवाई हो गया मामला फुस्स...दिल टूट गया मेरा...और खुद को संभालने के लिए मैंने पूरी शिद्दत से पुराने प्रेमचियों के नुस्खे अपनाए रो-रोकर बाल्टी भर दी जो अब तक देखा सुना था वही सब हुआ मेरे साथ कुछ भी नया नहीं हर जगह उसकी ही तस्वीर नज़र आने लगी हसीन लम्हों की याद दिल से उतरती ही नहीं थी कुछ दिनों बाद पता चला कि उसका मामला फिक्स हो गया है बिल्कुल कॉम्पिटेंट आइटम ढूंढ़ा था उसने उसने भी दीवार से दिल लगाने का चांस नहीं लियाबिल्कुल आंखें खोलकर अपने लिए सही आइटम का चुनाव किया यकीनन मेरे से ज्यादा काबिल था... हर लिहाज से... बाद में मुझे ये अहसास भी हुआ कि उसने बिल्कुल सही कदम उठाया था...


दिल तो बच्चा है जी... 
मेरी एक दोस्त है उसने भी लव मैरिज की है एक दिन उसकी प्रेमकहानी सुनी...वो भी परी टाइप आइटम है इसलिए उसके सामने भी मेरे जैसे आंखें खोलकर प्यार ढूंढ़ने वालों की कमी नहीं थी कई ऑफर आए उसे लेकिन उसे भी पुराने प्रेमचियों के अंधे प्यार पर भरोसा नहीं था आंखें खुली रखी थी उसने उसे भी किसी कॉम्पटीटेंट आइटम की तलाश थी अचानक एक दिन सोशल नेटवर्किंग साइट पर उसकी नजर एक आइटम पर गई पहले दोनों नेट फ्रेंड बने फिर एक-दूसरे को जाना समझा मैचिंग लेवल देखा फिर एक-दूसरे के साथ वक्त बिताना शुरू किया लेकिन इन सबके बीच न उसके दिल में धुआं उठा... और ना ही कोई हूक वगैरह का चांस बना जब उसे लगा कि मामला जम सकता है तो फिर बाकायदा उसने अपने आइटम के घर की रेकी की घरवालों से जाकर मिली और तब जाकर शादी का फैसला लिया अब मुझे लगा कि इसमें प्यार कहां से हुआ? दोनों ने प्यार थोड़े ही किया बस सोच-समझकर शादी की तब जाकर उसने मुझे समझाया कि दोस्त ऐसे ही होता है पुराने जमाने के प्रेमचियोंकी कही बात को सीरियसली मत लो अब ज़माना आगे निकल चुका है कहां पड़े हो तुम?



सच बात है... अब पुराने प्रेमचियों की कही बात की कोई वैल्यू नहीं रहीऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे खुद में कई और गिना सकता हूंकई और किस्से बता सकता हूं...इसलिए कहता हूं कि प्यार अब अंधा नहीं रह गया है...प्यार को आंखें मिल गई हैं

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Saturday, December 4, 2010

खुद के साथ जी ले ज़रा

धीरज वशिष्ठ
(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र, योग इंस्ट्रक्टर और स्वतंत्र पत्रकार हैं)
फेसबुक पर मेरे एक अज़ीज़ दोस्त ने लिखा है ‘’ जीवन में स्वयं को समय देना बहुत महत्वपूर्ण है...’’ । वे आगे सवाल करते हैं कि आप खुद के साथ कितना वक्त बिताते हैं ? ये वो सवाल है जो हमें सोचने के लिए मजबूर करता है। सही मायने में हम इस सवाल के जवाब को तलाशने के लिए बैठें तो हमें निराशा हाथ लगेगी। ऊपरी तौर से हमें लगेगा कि हम तो 24 घंटे अपने साथ ही होते है, खुद को हम सबसे ज्यादा वक्त देते हैं, लेकिन क्या ये जवाब सही है? नहीं, जवाब है- हम खुद को वक्त नहीं दे पा रहें हैं। इस तेज रफ्तार दुनिया में, सबकुछ पाने की हमारी छटपटाहट ने हमें खुद से बहुत दूर कर दिया है। आंखें हमेशा दूसरों को देखती है, कान दूसरों की सुनते हैं और हम खुद से वंचित रह जाते हैं। इस भीड़ में हमने खुद को अकेला कर रखा है।

सवाल है कि खुद को वक्त देना का मतलब क्या है ?  क्या खुद को वक्त देने का मतलब इतने भर से है कि हम कितने देर परिवार के साथ होते हैंकितना वक्त अपनी सेहत और व्यक्तित्व को निखारने के लिए निकाल पाते हैं ?  कितना वक्त हम खुद के मनोरंजन में दे पातें हैं..वगैरह..वगैरह।

नहीं.. खुद को वक्त देने का मतलब कहीं गहरा है। बुद्ध से जब यही सवाल पूछा गया था तो उन्होंने कहा कि ‘’होश के साथ जीना ही जिंदगी है और बेहोशी मौत है’’। हम अपने साथ होते है, लेकिन शारीरिक तौर से सिर्फ, मानसिक तौर पर हम कहीं और होते हैं। खुद को वक्त देने का मतलब सिर्फ इतने भर से है कि आप जो भी करें होशपूर्वक करें। क्या कर रहें हैं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। आप का काम घास काटने का है या न्यूज़ परोसने का या कुछ और, आप जो भी करें होश के साथ करें।

जीने की राह दिखता आध्यात्म 
आपने कभी गौर किया है जब आप ऑफिस में होते हैं तो आप ऑफिस में नहीं बल्कि घर पर होते है, और जब घर में होते हैं तो ऑफिस में क्या करना है, इसका ख्याल दिमाग में चल रहा होता है। हम ऑफिस में होते हैं तो घर की सोचते हैं.. बीवी क्या कर रही होगी.. बच्चे स्कूल से आएं या नहीं..? घर में होते हैं तो सोचते है कि आज ऑफिस में कौन सा काम निपटाना है। हम बंटे हुए हैं.. और हमारा ये खंडित व्यक्तित्व हमें अपने साथ नहीं होने देता।

सवाल फिर वही उठता है कि जिंदगी में हम खुद को कैसे वक्त दें ? अपने साथ होने की कला को हम कैसे विकसित करें ? तंत्र और योग ने इसको लेकर कई अहम प्रयोग किएं हैं। तंत्र की पूरी तकनीक इसी पर फोकस करती है कि हम कैसे अपने साथ हो सकें।

होशपूर्वक जीने की इस कला को आप छोटे-छोटे लेकिन काफी असरदार प्रयोगों से सीख सकते हैं। हम खाने के वक्त अक्सर या तो टीवी ऑन कर देते हैं या गप्पे मारते रहते हैं। तंत्र कहता है कि जब भोजन करें तो आप स्वाद बन जाएं, यानी भोजन से जो स्वाद मिल रहा है पूरी तरह से मन को उसमे लगा लें। भोजन के स्वाद के साथ ऐसा एकाकार हो जाएं कि पता ही नहीं चलें कि स्वाद और आप अलग-अलग हैं। बहुत साल बाद दोस्त या रिश्तेदारों के साथ मिलने के वक्त आपको जो खुशी होती है, उसके साथ मन को जोड़ने की कोशिश करें। खुशी के इस अहसास को ज्यादा देर तक अपने साथ आत्मसात होने दें..इसे जल्दी काफूर नहीं होने दें। जब कभी सिर या बदन में दर्द महसूस हो तो चिल्लाएं या रोएं नहीं, शांत होने की कोशिश करें और मन को दर्द के साथ जोड़ लें। दर्द के साथ मन को जोड़ना आसान है। आप पाएंगे जैसे ही दर्द के साथ आपका मन एक होता जाएगा, दर्द की अनुभूति कम होती जाएगी। किताब पढ़ रहें हो तो आप किताब हो जाएं, एक-एक शब्दों में ऐसे खो जाएं कि जैसे हर एक लाइन आप की कहानी कह रहा हो।


ये छोटे-छोटे ऐसे प्रयोग हैं जो हमें होश से भर देंगे। हमें अपने साथ होने की कला सिखा देंगे। मतलब साफ है जो भी करें पूरी तत्परता के साथ करें.. खाने के वक्त खाना, काम के वक्त काम.. ये वो सूत्र है जो आप के अंदर एक नए शख्स को जन्म देंगे।

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Friday, December 3, 2010

अब तेरा क्या होगा 'कालिया'...?

मनोज मुकुल 
(लेखक आईआईएमसी] नई दिल्ली के पूर्व छात्र और स्टार न्यूज़ में एसोसिएट सीनियर प्रोडयूसर हैं)
बिहार चुनाव के नतीजों को लेकर नीतीश कुमार के विरोधी तो कभी भी ऐसी उम्मीद लगाकर नहीं बैठे रहे होंगे। चुनावी साल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और नीतीश के हमकदम माने जाने वाले ललन सिंह ने अपना हिसाब-किताब अलग कर लिया। नीतीश तानाशाह हैं, पार्टी में लोकतंत्र खत्म हो गया और न जाने दुनिया भर के क्या-क्या आरोप लगा पटना से दिल्ली में आसन जमा लिया। उन्होंने बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस को ‘सेट’ कर अपना राजनीतिक प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया। कांग्रेस को भी लगा कि भैया बड़ा नाम है, पुराने सहयोगी हैं। नीतीश का फायदा कराया अब हमारा भी फायदा कराएँगे। सांसद बने जेडीयू के टिकट पर और चुनाव में प्रचार के लिए गाड़ी में कांग्रेस का झंडा लगाकर खूब घूमे लेकिन लोगों ने लाइन पर ला दिया। अब कांग्रेस के लिए भी बेचारे किसी काम के नहीं रहे। उपर से झंडा लगाकर घूमने और कांग्रेस के मंच से भाषण देने को लेकर सदस्यता खतरे में है। नीतीश कुमार के लोग चाहते हैं कि इनको पार्टी से निकालकर शहीद बनाने के बजाए बेहतर होगा इनकी संसद सदस्यता के खिलाफ पहले शिकायत की जाए। लिहाजा चुनाव आयोग और लोकसभाध्यक्ष से शिकायत की तैयारी है। पूरे सबूत के साथ। अगर वहां से कुछ फायदे वाला जवाब पार्टी को नहीं मिला तो किसी भी दिन इनको चलता कर दिया जाएगा। वजह जिस बंटाईदारी बिल को लेकर ललन ने बिहार में हायतौबा मचाई थी उसको लेकर तो बंटाइदारी बिल वाले समाज के लोग सरकार के खिलाफ गए नहीं, तो भला अब समाज का विश्वास खो दिया, नेता का भरोसा खो दिया, जिसके साथ गए उसको कोई फायदा नहीं हुआ तो ऐसे खोटे सिक्के का काम क्या ? बताते चलें कि ललन सिंह अभी मुंगेर से जेडीयू के सांसद हैं।
नीतीश की आंधी में उड़े सारे विरोधी 
औरंगाबाद के जेडीयू सांसद हैं सुशील कुमार सिंह पहले विधायक हुआ करते थे। एक बार सांसद भी रहे। इस बार चाहते थे कि औरंगाबाद से भाई को टिकट मिले जेडीयू का। लेकिन सीट थी बीजेपी के खाते की। चुनावभर औरंगाबाद में नीतीश कुमार को  परेशान करते रहे। अंत में न कुछ समझ में आया को भाई को लड़ा दिया लालू की पार्टी के टिकट पर। पार्टी और गठबंधन के उम्मीदवार को हराने के लिए पूरा ताकत झोंक दी, भाई तो इनके हारे ही, लेकिन जहां इनका घर पड़ता है वहां से भी नीतीश के उम्मीदवार की जीत हो गई। बीजेपी वाले जोर लगाए बैठे हैं कि भइया इनको ‘कल्टी’ कराओ। और तो और औरंगाबाद में इनको बैलेंस करने के लिए इन्हीं के समाज के नेता को, जिन्होंने इनके भाई को हराया उनको मंत्री बना दिया गया है। इन पर अनुशासन का डंडा चलाने के लिए स्क्रिप्ट टाइप हो रही है।


आगे बढ़िए महाबली सिंह बेचारे बीएसपी, आरजेडी और कहां-कहां घूमते फिरते नीतीश की शरण में आए। चुनाव हुआ लोकसभा का तो इनको काराकाट से टिकट दे दिया। अब इनका खेल देखिए जिस चैनपुर सीट से विधायक थे वहां अपने बेटे धर्मेंद्र को टिकट दिलवाकर विरासत बरकरार रखवाने के फेर में थे लेकिन पार्टी ने सिग्नल रेड कर दिया । और सुनिए ये तो विधायक बनने के बाद पार्टी बदलते रहे लेकिन इनके बेटे इनसे भी फास्ट निकले। विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए ही पार्टी बदल दी। आरजेडी के टिकट पर लड़ गए। धर्मसंकट में फंसे बाबूजी ने पार्टी के नीति, सिद्धांत को ताक पर रखकर बेटे के लिए मोर्चा संभाल लिया लेकिन बेटा बेचारा बाबूजी की विरासत को संभाल नहीं पाया।


ललन सिंह 
पूर्णमासी राम, लालू-राबड़ी के जमाने में खाद्य-आपूर्ति मंत्री होते थे।  दूरदर्शी थे तभी मौका देखकर 2005  में ही पलटी मार गए और लोकसभा चुनाव के वक्त किस्मत ने साथ दिया तो गोपालगंज से जेडीयू के टिकट पर जीतकर दिल्ली का मुंह भी देख लिया। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद उनकी विधानसभा सीट पर जो उपचुनाव हुआ, उसमें उन्होंने खेल कर दिया। बेटे के लिए टिकट चाहते थे। नहीं मिला तो पार्टी के खिलाफ प्रचार किए और बगहा में पार्टी हार गई। सजा मिली तो इनको पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया। लेकिन इस बार चुनाव से पहले फिर से उनको पार्टी ने साथ ले लिया। इस बार फिर बेटे का टिकट चाहते थे, अड़ गए लेकिन पार्टी ने फाइनली टिकट नहीं दिया। आदत से लाचार पूर्णमासी राम ने फिर मुंह खोला, बेटे को हरसिद्धि से लड़वा दिया वो भी कांग्रेस के टिकट पर। अब कहां बगहा और कहां हरसिद्धि। गोपालगंज की किसी सीट से लड़ते तो लोग शायद सोचते भी कि सांसद का बेटा है। इनको लगा कि पूरे बिहार के महादलित इन्हीं के इशारे पर चलते हैं। ‘छोटे नवाब’ को कुल जमा 6000 वोट मिले हैं। यहां भी बीजेपी के उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने चले थे जेडीयू के सांसद महोदय। अब इनका अपना खेल बिगड़ने वाला है।


मोनाजिर हसन। लालू के साथ रहे तो उनको तेल लगाया। पांच साल पहले नीतीश के साथ हुए तो नीतीश को तेल लगाया। नीतीश को लगा कि मास लीडर है सो फायदा भी कराया। मंत्री बनाया। लोकसभा चुनाव के वक्त टिकट देकर सांसद बनवा दिया। वो भी उस बेगूसराय सीट से जहां इनको कोई पूछे न लेकिन इनको तो लग रहा है कि पूरे बिहार के मुसलमानों के यही इकलौते नेता हैं। खैर विधानसभा का जब उपचुनाव हुआ तो उम्मीदवारी को लेकर ललन सिंह से भिड़ गए। नतीजा हुआ कि उस समय लालू के उम्मीदवार की जीत हो गई। इस बार मोनाजिर भाई को लगा कि अपनी बेगम को भी विधायक बना लेंगे। लेकिन शायद नीतीश को उपचुनाव वाला खेल याद था सो टिकट नहीं मिला। लेकिन खेलल-खालल नेता मानने वाला थोड़ा था, लालू से हाथ-पैर जोड़कर अपनी बीवी को आरजेडी के टिकट पर खड़ा करवा दिया। बेचारे लालू की पार्टी के जो विधायक थे, साल भर में ही उनको मोनाजिर ने सेट कर दिया। लेकिन लोग तो भाई का खेल समझ गए लगते हैं। तभी तो मोनाजिर भाई बेगम को हरा दिया। अब मोनाजिर किसी को मुंह नहीं दिखा रहे। पटना में रुकने की बात छोड़ दीजिए। नया घर तलाश रहे हैं लेकिन लालू के लिए भी फुंके कारतूस हैं बेचारे।


मोनाजिर हसन 
उपेंद्र कुशवाहा से बहुत कम लोग परिचित होंगे। नीतीश के बाद पार्टी में किसी जमाने में नंबर दो हुआ करते थे। एक बार जन्दाहा से विधायक थे। झारखंड बंटा और सुशील मोदी के लिए जब नेता विपक्ष का नंबर घट गया तो समता पार्टी ने इन्हें विरोधी दल का नेता बनाया। 2005 के चुनाव में हार गए। इन्हीं के समाज के नागमणि की पूछ बढ़ गई और इनको कोई पूछने वाला नहीं रहा तो लगे नीतीश के खिलाफ अनाप-शनाप बोलने। पार्टी छोड़ एनसीपी में चले गए। घूम-घूम के कोइरी के नेता के रूप में अपनी दुकानदारी चमकाने की नाकाम कोशिश में जुटे। कोई फायदा नहीं दिखा तो लोकसभा चुनाव के बाद फिर से नीतीश से सेटिंग कर पार्टी में लौट आए। तब तक बेचारे नागमणि से नीतीश का संपर्क ठीक नहीं रह गया था। इनको लगा कि कोइरियों के सबसे बड़े नेता तो हम ही रह गए हैं। नीतीश की भी मजबूरी थी नागमणि भाग जो गए थे सो इनको राज्यसभा भेजा गया। अब देखिए राज्यसभा सांसद बनने के बाद लगे रंग दिखाने। लगा कि हमसे बड़़ा कोइरियों का तो कोई नेता नहीं है, लेकिन टिकट बंटवारे में किसी ने पूछा नहीं इनको। उल्टे नीतीश ने इनसे भी बड़ा एक कोइरी नेता को शामिल करा लिया पार्टी में। लेकिन इनकी गणित काम कर गयी, बेचारे कोइरियों के बड़े नेता जो नीतीश के बौरो प्लेयर थे,  हार गए हैं। अब कुशवाहा जी इसे अपनी जीत मान रहे हैं लेकिन नीतीश के लोग अपनी हार। अब इनका क्या होगा.. नीतीश जाने।


ये बात तो सिर्फ जेडीयू की है। आरजेडी में भी महाराजगंज वाले सांसद उमाशंकर सिंह परेशान हैं। चुनाव में उनको लालू ने पूछा नहीं। प्रभुनाथ सिंह के कर्ता-धर्ता बने रहे। अब जिस प्रभुनाथ सिंह को हराकर वो सांसद बने थे उनकी बढ़ती हैसियत ने इनको नाराज कर दिया। चुनावभर खाली आरजेडी और प्रभुनाथ सिंह के समर्थकों को घूम घूमकर हराने में लगे रहे। कामयाब भी रहे। अब नीतीश के विकास की माला जप रहे हैं। वैसे भी नीतीश के साथ काम कर चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा को जब विपक्ष का नेता बनाया गया था, बिहार में। उस वक्त बिहार में समता पार्टी विधायक दल के नेता उमाशंकर सिंह ही थे। बाद में लालू से सट गए। अब ये क्या करेंगे या इनके साथ लालू क्या करेंगे ये तो ये जाने या फिर लालू। 

ऐसे नेताओं के खिलाफ संगठन के लोग नाराज हैं। वैसे भी परंपरा तो गलत ही है, अनुशासन में लोग न रहे तो हर कोई ऐसा करेगा। तब तो भगवान मालिक है राजनीतिक दलों का।

Monday, November 29, 2010

कब गंभीर होंगी भोजपुरी फिल्में..?

मंजीत ठाकुर 
(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र और डीडी न्यूज़ में वरिष्ठ  संवाददाता हैं )
पिछले साल नबंवर में गोवा में हुए भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में भोजपुरी फिल्मों की गैरमौजूदगी पर पत्रकार बिरादरी ने कुछ सवालात उठाए थे। आयोजकों के जवाब से और लोगों की राय से जो बात सामने आई कि ज़्यादातर लोग भोजपुरी फिल्मों को समारोह के लायक नहीं मानते। मलयालम, तमिल और कन्नड़ सिनेमा के बेहतर प्रतिनिधित्व के बरअक्स भोजपुरी फिल्मों का मौजूदा स्तर थोड़ा हताश करने वाला है।

भारतीय सिनेमा के क्षितिज पर भोजपुरी फिल्मों के उदय के दूसरे चरण को देखकर सुखद आश्चर्य होता है। ससुरा बड़ा पईसावाला, दारोगाबाबू, आईलवयू से चलकर भोजपुरी फिल्मों ने गंगा और ऐसी ही फिल्मों से अलग मुकाम हासिल कर लिया है। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर क्या वजह रही कि संघर्षरत लोकगायक मनोज तिवारी अचानक सुपरस्टार बन जाते हैं। अमिताभ, नगमा, अजय देवगन और  जैकी श्रोफ जैसे कलाकार भोजपुरी फिल्मों में काम करने के लिए तैयार है।



निकलना होगा हंसी-मजाक से बाहर 
जाहिर है, काल के स्तर पर बेहद निचले दर्जे का होने पर भी भोजपुरी का बेहतरीन बिज़नेस नामी बनियों को इस भाषा तक खींच लाया है। 30 लाख की लागत से बनी मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पईसावाला जैसी सेक्स कॉमेडी ने 15 करोड़ का बिज़नेस किया और उनकी ही दूसरी फिल्म ‘दारोगा बाबू आईलवयू’ ने करोड़ की कमाई की।

भोजपुरी फिल्मों में अब पुराने बॉलीवुड हिट फिल्मों के रीमेक का दौर आ रहा है। शोले,  नमक हलाल जैसी कई फिल्मों का भोजपुरीकरण किया जा रहा है। स्पाइडरमैन जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म के मकड़मानव के रूप में रिलीज़ होना भोजपुरी के बाज़ार की ताकत का इज़हार ही तो है। नमक हलाल भी बबुआ खिलाड़ीददवा अनाड़ी के नाम से तैयार की जा रही है।

यहां तक सब कुछ बेहतर है। हिंदी फिल्मों का हिंदी पट्टीवाला भदेस दर्शक भोजपुरी फिल्मों की ओर शिफ्ट हो गया है। ससुरा... और दारोगा बाबू.. जैसी छोटे बजट की फिल्में उस वक्त रिलीज हुईं जब बॉलीवुड की ए-ग्रेड की फिल्में अभिषेक-अमिताभ-रानी की बंटी और बबली और आमिर खान की मंगल पांडे-द राइजिंग के कारोबार पर बढ़त पा ली थी। लेकिन, लगता है कि अब भोजपुरी फिल्मों के जागने का वक्त आ गया है। द्विअर्थी संवादों, खराब संपादनऔर कहानी में लौंडा नाच जैसी चीजें दर्शक को सिनेमाहॉल तक खींच लाने के लिए ज़रूरी तो है, लेकिन किस्सागोई की जो शानदार परंपरा बंगला, मलयालम और कन्नड़ सिनेमा में है, गंभीर दर्शक भोजपुरी में भी वैसा स्तर देखने की उम्मीद में है।

क्या ये वक्त नहीं है कि भोजपुरी सिनेमा थोड़ा गंभीर होकर सोचे..? आखिर हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने भोजपुरी की ओर क्यों रुख किया है। जा़हिर हैकारपोरेट, कभी खुशी कभी ग़म, कुछ-कुछ होता है या ऐसी ही बड़ी तादाद में बन रही फिल्मों से हिंदी पट्टी का गंवई दर्शक जुड़ नहीं पा रहा था। दरअसलये फिल्में बनी  भी  गंवई  दर्शकों  के लिए  नहीं  थी।

ये तो बनी ही थीं, सात समुंदर पार बसे अप्रवासी दर्शकों के लिए। पहले भी फिल्मों की तड़क-भड़क और ग्लैमर में गांव नकली था। नकली किसान और गांव की गोरी भी नकली। ऐसे में भोजपुरी फिल्मों ताज़ा हवा के झोंके की तरह नमूदार हुईँ। ससुरा.. में ही देखें तो असली परिवेश में असली चौकी, लोटे, और घटनाओं के साथ कहानी को फिल्माया गया है। ऐसे में दर्शक सीधे अपने आसपास की चीज को परदे पर देखकर सम्मोहित हो गया। इन फिल्मों में वह सब था, जो मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों से गायब हो गया था।

लेकिन बीतते वक्त के साथ भोजपुरी फिल्मों में ताज़ा बयार बहाने की उम्मीद अब धूमिल पड़ती जा रहा है। इन फिल्मों में भी वही सब - यानी मारधाड़रोमांस, फूहड़ हास्य और बेढभ गाने हैं- जो हिंदी फिल्मों में देख-देखकर दर्शक ऊब गया था और उसी वजह से भोजपुरी की ओर शिफ्ट हुआ था। ऐसे में भोजपुरी सिनेमा को ज़रूर तमिल सिनेमा से सबक सीखने की ज़रूरत है।

कुछ साल पहले तक तमिल सिनेमा भी कथानक के स्तर पर उसी दौर से गुजर रहा था, जहां अभी भोजपुरी का सिनेमा खड़ा है। लेकिन हाल में युवा निर्देशकों की टीम ने मणिरत्नम की राह चलते हुए एक नई ज़मीन फोड़ी है। तमिल में ‘कादल’ के बाद ‘कल्लूरी’ इस साल की कामयाब फिल्म साबित हुई है। दरअसल, तमिल सिनेमा में एक ऩई धारा पैदा हुई है।

भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी 
समकालीन तमिल सिनेमा में आ रहे शांत लेकिन रेखांकित किए जाने लायक बदलाव की कहानी बयां कर रहा है। यह धारा एक नए बौद्धिक, यथार्थवादी और मजबूत पटकथा वाली किस्सागोई वाली फिल्मों की है। फिल्म में चरित्रों, प्लॉट और संवादों को अचूक तरीके से पिरोया गया है।

ये चरित्र छोटे शहरों के होने पर भी हीनभावना से ग्रस्त नहीं है और अपने खांटी गंवईपन को संवेदनाओं के साथ उघाड़ते हैं। फिल्म के सारे चरित्र बिलाशक दक्षिण भारतीय दिखते हैं। ज़ाहिर है, उन्हें दिखना भी चाहिए। फ्रेम में दिख रहा हर चेहरा असली दिखता है। पात्रों के चेहरे पर जबरन मेकअप पोतकर सिनेमाई दिखाने की कोई कोशिश नहीं है।


क्या सवाल महज इन फिल्मों की कला, उम्दा निर्देशन या उत्कृष्ट कहानी हीहै..। जी नहीं, इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तगड़ी कमाई भी की है। कल्लूरी जैसी फिल्में अपने कम बजट और यथार्थवाद के बावजूद बड़े सितारे वाले फिल्मों की बनिस्बत ज़्यादा मनोरंजक साबित हो रही हैं। दरअसल, तमिल सिनेमा की इस नई धारा ने व्यावसायिक सिनेमा की ऊर्जा और मनोरंजन को कला सिनेमा की जटिलता और संवेदना में खूबसूरती से पिरो दिया है। इस धारा की झलक तो मणिरत्नम की ‘नायकन’ और ‘आयिता इझूथु’ में ही मिल गई थी,  लेकिन ऩई पीढ़ी के फिल्मकारों तक यह संदेश पहुंचने में एक दशक से ज़्यादा का वक्त लग गया।


इन फिल्मों के साथ ही तमिल सिनेमा के एक नए दर्शक वर्ग, युवा दर्शकों का उदय हुआ है। जो नई चीज़ देखना पसंद कर रहा है। पिछली दीवाली पर धड़ाके के साथ रिलीज़ हुई आझागिया तमिल मागन, वोल और माचाकाईन जैसी व्यावसायिक बड़े बजट की फिल्में दर्शकों के इस वर्ग को मनोरंजक नहीं लगता। दरअसल, दर्शकों के इस वर्ग को नई धारा के खोजपूर्ण सिनेमा का चस्का लग गया है। तमिल फिल्मों की इस नई धारा की एक और खासियत है- शैली। हर निर्देशक का अंदाज-ए-बयां ज़ुदा है। इनमें गाने सीमित है, आम तौर पर ये गाने भी पृष्ठभूमि में होते हैं।


छोटी अवधि की इन फिल्मों में कॉमेडी के लिए भी अलग से समांतर कथा नहीं चल रही होती  बल्कि हास्य को कथानक के भीतर से ही सहज स्थितियों से पैदा किया जा रहा है। ज़्यादातर फिल्मों के विषय बारीकी से परखे हुए होते हैं- गंवई कहानियों का बारीक ऑब्जरवेशन। तमिल सिनेमा की इस नई बयार के ज्यादातर चरित्रों की जड़े परिवार,  संस्कृतियों और परंपरा में गहरे धंसी हैं। नए तमिल निर्देशकों ने एक ऐसे दर्शक वर्ग के बारे में संकेत दे दिया- जो चरित्रप्रधान,  अच्छी पटकथा वाले कम बजट की फिल्मों को सर आंखों पर बैठाने के लिए तैयार है।


तो सवाल ये है कि क्या भोजपुरी दर्शक अच्छी फिल्मों से उदासीन ही रहना चाहते हैं या फिर उसे ठीक फिल्में मिल नहीं पा रही है। कैमरे की भाषा को और अच्छा किया जा सकने के ढेरों संभावना भोजपुरी में मौजूद हैं। स्थानीय मुद्दों पर बात करने के लिए ज़रूरी नहीं कि हर फिल्म में होली का फूहड़ गीत या लौंडा नाच डाला जाए। भोजपुरी फिल्मों के प्रति अश्लील होने की मानसिकता बन चुकी है, क्या वह बदल नहीं सकती। क्या भोजपुरी निर्देशकों में कोई शक्तिवेल, कोई हृतिक घटक, सत्यजीत रे या अडूर नहीं।
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