Thursday, December 9, 2010

कब मिलेगी औरतों को सुरक्षा गारंटी ?

शिखा द्विवेदी 
(लेखिका आईआईएमसी, नई दिल्ली की पूर्व छात्रा हैं। वे कॉमनवेल्थ गेम्स मे बतौर मीडिया मैनेजर अपनी सेवाएं दे चुकी हैं)
दिल्ली में एक डर दिनोदिन बढ़ता जा रहा है या यूं कहे इस डर ने दिल्ली की ज़्यादातर महिलाओं के दिलों में अपना घर बना लिया है और वो है उनकी सुरक्षा का डर। 6 साल पहले जब मैं दिल्ली आई थी तो देर रात अकेले सड़कों पर न जाने की हिदायत मिलती थी और अब दिन में भी अकेले निकलने में सोचना पड़ता है। इसे क्या मानें? जितने तेज़ी से हमारे देश में महिलाएं तरक्की की सीढियां चढ़ रहीं हैं उतनी ही तेज़ी से उनकी सुरक्षा लुढ़क कर नीचे आ रही है?

घर-बाहर कहीं भी महफूज़ नहीं है औरत 
दिनदहाड़े सवारियों से भरी बस में एक लड़की को चार-पांच गुंडे घेर लेते हैं, उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं। यहां तक कि उसका लैपटॉप छीन लेते हैं और अगली रेडलाइट पर आराम से उतर कर चले जाते हैं लेकिन बस में बैठा एक भी शख़्स उस लड़की की मदद के लिए आगे नहीं आता है। मेरा ऐसे लोगों से एक ही सवाल है कि क्या वाकई उनकी सांसें चल रहीं थीं? रास्ते पर अकेली खड़ी लड़की को राह चलता कोई भी बाइक या साइकिल सवार अश्लील बातें सुनाकर चला जाता है, खचाखच भरी बस में चढ़ना तो लड़कियों के लिए जैसे सबसे बड़ा पाप है। फिर तो बिना किसी की गंदी नज़रें झेले या घटिया कमेंट सुने, आप नीचे उतर ही नहीं सकते।  

कौन देगा इस सवाल का जवाब?
समाज शिक्षित होता जा रहा है और बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रहीं हैं। एक मामला सुलझता नहीं कि दूसरा सामने आ जाता है। अभी हाल ही में धौलाकुआं गैंगरेप के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हर बड़े-छोटे न्यूज़ चैनल पर चर्चा हुई। पुलिस के आला अधिकारियों से लेकर महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली बड़ी-बड़ी हस्तियों ने इसमें हिस्सा लिया। सबने अपनी-अपनी राय और सलाह दी। इन चर्चाओं में एक बात बहुत ही अजीब लगी। कुछ वक्ताओं का मानना था कि महिलाओं को सलीकेदार कपड़े पहनने चाहिए क्योंकि बलात्कार की बड़ी वजह उनका पहनावा भी है। ऐसे लोगों से मेरा सिर्फ एक ही सवाल है कि फिर एक सात साल की बच्ची के साथ बलात्कार क्यों होता है? या फिर अधेड़ उम्र की मां क्यों बनती है दरिंदों का शिकार? अस्पतालों या स्कूलों में क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं?

एक सवाल ये भी है कि बलात्कार के अपराध में सज़ा पा चुके अपराधी भी रिहा होने के बाद वो ही अपराध दोहराता है। ऐसी सज़ा का क्या फ़ायदा जो किसी की सोच न बदल सके या फिर उसमें इतना डर न पैदा कर सके कि दोबारा कुछ भी गलत करने की उसकी हिम्मत न हो।  

कौन बचायेगा इन भेड़ियों की नज़रों से 
दिल्ली को तो महिलाओं के लिए हमेशा से असुरक्षित शहर माना जाता रहा है लेकिन चौकाने वाली बात ये है कि महिलाओं के लिए सुरक्षित कही जाने वाली मुंबई में भी ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में साल 2009 में 126 बलात्कार के मामले सामने आए थे जो 2010 में बढ़कर 194 हो गए हैं।


कोई कहता है विचारों में बदलाव ज़रूरी है, किसी का मानना है कि शिक्षा और जागरूकता से ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। लेकिन जब पढ़े-लिखे और जागरूक आईएफ़एस अधिकारियों पर इस तरह के आरोप सामने आते हैं तो सोच फिर एक नई दिशा तलाशने लगती है कि आखिर वजह क्या है और समाधान कैसे होगा? कई पार्टियां महिलाओं को संसद में 33 फ़ीसदी आरक्षण दिलाने की गारंटी के साथ चुनाव लड़ती है, क्या ये पार्टियां कभी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी पर कोई बड़ा कदम उठाने की कोशिश करेंगी?

Wednesday, December 8, 2010

क्या है इस देश में एक जान की कीमत?

फटते हैं बम चीख उठती इंसानियत  
कौन हैं वो लोग जो बम बनाते हैं, इससे अच्छे तो वो कीड़े हैं जो रेशम बनाते हैं बुधवार सुबह उठते ही जब अखबार खोला तो ये लाइनें पढ़कर कुछ अजीब सा महसूस हुआ। रेशम से तुरंत ही दिमाग में बनारसी साडि़यों की याद आ गई। मेरे कुछ रिश्तेदार रहते हैं वहां। मंगलवार को बनारस के शीतला घाट पर बम फटा। वहां हर कोई किस्मत वाला था सिवाय छोटी सी स्वास्तिका के। 18 दिसंबर को उसका दूसरा जन्मदिन था। उसके मम्मी-पापा ने उसका बर्थ डे मनाने की तैयारियां शुरू कर दी थीं। यूपी सरकार ने स्वास्तिका के परिजनों को एक लाख रुपये का मुआवज़ा देने की बात कही है। पैसे से अगर दिल के ज़ख्म भर जाते तो क्या बात थी?

क्या कसूर है मासूमों का?
स्वास्तिका के पिता संतोष के मुताबिक उनकी बेटी अपनी मां की गोद में थी। अचानक धमाका हुआ और बेटी पर कुछ पत्थर आकर गिरे। मदद के लिए मैं और मेरी पत्नी चिल्लाए लेकिन कुछ नहीं हो सका। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मासूम स्वास्तिका की सांसें थम गईं। धमाके में सिर्फ एक बच्ची की मौत हुई थी तो ज़्यादा हंगामा भी नहीं हुआ। हंगामा हो भी क्यों? मेरी-आपकी लाडली तो थी नहीं स्वास्तिका। रोएंगे मासूम स्वास्तिका के मां-बाप और बूढ़े दादा। कभी अपने घर के दो साल के बच्चे की खिलखिलाहट को महसूस करिएगा। वो लम्हा भी महसूस करिएगा जब आपके बच्चे को चोट लग जाए और वो रो पडे़। इतना सोचकर ही छाती फट जाती है। अब ज़रा स्वास्तिका के परिवार के दर्द को फिर से महसूस करिए। सच कहा जाए तो हमारी संवदेनाएं मर चुकी हैं।

26/11 के हमले ने पूरे देश को एकसाथ खड़ा कर दिया। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। 2009 में समाज में फिर मुर्दा ख़ामोशी छा गई। 2010 आते-आते तो हम लोगों ने ऐसा बर्ताव किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। क्या कीमत लगाई जाती है इस देश में एक जान की? एक, दो, पांच, सात या फिर 10 लाख। सरकार दे देती है न चेक। पैसा लीजिए और नेताओं की जान छोडिए। इधर स्वास्तिका के घर में आंसू थमे भी नहीं थे कि यूपी सरकार और केंद्र के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया। यूपी के डीजीपी करमवीर सिंह तो सबसे आगे निकले। बुधवार सुबह हर अख़बार में उनका बयान छपा था। कह रहे थे, हमारे पास कोई इंटेलिजेंस इनपुट नहीं था। वैसे भी यूपी में सब भगवान भरोसे ही है। राहुल गांधी आकर लौट जाते हैं और खुफियागीरी करने वाले कहीं चुनई बना रहे होते हैं। बुधवार को चिदंबरम वाराणसी पहुंचे। बोले, हमने तो यूपी सरकार को पहले ही अलर्ट कर दिया था। थोड़ी देर बाद यूपी के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह टीवी पर दिखे। बोले, हमें केंद्र सरकार ने कोई इंटेलिजेंस इनपुट नहीं दिया। दोनों एक-दूसरे पर तोहमत जड़ रहे हैं। वो भी इसलिए कि सिर्फ एक मासूम बच्ची की ही तो मौत हुई है। देश में दहशत है लेकिन कोई खास रिएक्शन नहीं दिखा। पब्लिक भी तब बोलती है जब खून-खराबा ज़्यादा हो जाता है।  याद कीजिए 26/11 के पहले का वो दौर जब बम धमाके रुटीन में होने लगे थे तो तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल और गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल टीवी पर आते थे। कहते थे, हमने राज्य को पहले ही अलर्ट कर दिया था। जब मुंबई पर हमला हुआ तो श्रीप्रकाश गायब ही हो गए थे। बीते दो सालों में कुछ बड़ी आतंकी हरकतें कम हुई तो नेता फिर बेलगाम हो गए।

मुआवजा देकर सरकार का काम पूरा 
ताज़ा मामले को देखिए। केंद्र और यूपी के बीच कुछ उस तरह की बयानबाज़ी हो रही है जैसे एक ज़माने में सौरव गांगुली और स्टीव वॉ के बीच होती थी। अब देखना ये है कि इस मैच में सौरव कौन बनेगा? चिदंबरम की तो बात ही निराली है। एक साल की चुस्ती और फिर सुस्ती। कॉमनवेल्थ खेलों के पहले जब पूरी दिल्ली पर गहरा पहरा था तो बाइक पर कुछ सिरफिरे आए और गोली-बम चला गए। अभी तक कोई नहीं हत्थे चढ़ा? क्या कहा जाए इसे? काहिली, हरामखोरी या कुछ और। आंकड़ें बताते हैं कि 2005 से अब तक 10 बम धमाकों में 517 लोगों की मौत हो चुकी है। 

स्वास्तिका की मौत पर खूब राजनीति हो रही है लेकिन इस समाज के लिए कवि पाश एक सन्देश देकर गए हैं...

सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शान्ति से भर जाना
न होना तड़प का !!
सब सहन कर जाना...


(लेखक विवेक आनंद/प्रवीन मोहता आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं)

Tuesday, December 7, 2010

मन मत मारो, हमारी सलाह मानो...

मंजीत ठाकुर 
(लेखक आईआईएमसी, नई दिल्ली के पूर्व छात्र और डीडी न्यूज़ में वरिष्ठ संवाददाता हैं)
सुना तो नाम बहुत था मुहब्बत का..लेकिन निकला वही। बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, काटा तो कतरा-ए-ख़ूं न निकला की तर्ज पर। आजकल लोग ब्लॉग पर भी प्रेम को लेकर बेहद भावुक हो रहे हैं। 


वैलेंटाइन डे दो महीने ही दूर है। लड़कियां लड़कों की और लड़के, लड़कियों की तलाश में ज़ोर-शोर से भिड़े हुए हैं। 


महर्षि वैलेंटाइन का दिवस मनाना ज़ोर पकड़ रहा है। जिन्हें जोड़ा हासिल नहीं हो पाता. वो  अपनी खीझ निकालते हैं- अपसंस्कृति, अश्लीलता चिल्ला-चिल्लाकर। दरअसल, दोष इस पीढी का नहीं। जनाब दोष तो उस पीढी का भी नहीं। 


उन्हें पता है कि उम्र के एक खास मोड़ तक आदमी इसी ग़लतफहमी में पड़ा रहता है कि उसका भी एक-न-एक दिन कहीं-न-कहीं किसी न किसी से यक-ब-यक प्यार हो जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे आस-पड़ोस की लड़कियां धड़ाधड़ अन्य लोगों की बांहों इत्यादि में जाने लगती हैं, तो उसे यह तत्वज्ञान होता है कि प्रेम होता नहीं, वरन् बेहद कोशिशों के बाद किया जाता है। इसके लिए कई दोस्तों को फील्डिंग करनी होती है। और हां , ये प्यार को खींचना जिसे अच्छी भाषा में निभाना कहते हैं, वह भी बेहद कठिन क्रिया होती है क्योंकि इसमें कलदार खर्च होते हैं। बहरहाल, मित्रों के मर्म को न छूते हुए मैं लड़कियों को अपने प्यार में गिरफ्तार करने, या उन्हें प्यार में डालने या लुच्चो की भाषा में पटाने के कुछ ऐसे तरीकों पर प्रकाश अर्थात लाइट डालने की हिमाकत करूंगा,  जिसे कई मनीषियों ने अपने अर्जुन टाइप बेहद निकट शिष्यों को बताया है।


क्या पता आपकी भी बन जाए जोड़ी...
पहला तरीका तो यही है, कि उस लड़की के, जिसे आप पिछले तीन महीनों से प्यार कर रहे हैं और उसे अभी तक इस बात का पता भी नहीं है, उसके घर के चक्कर लगाना शुरु कर दें। प्यार के मामले में लड़कियों वाली गली को महबूब की गली,  प्यार की गली,  यार की गली, तेरी गली जैसे बेहद मुकद्दस नामों से नवाजा जाता है।


बशीर बद्र की एक पंक्ति याद आ रही है-  

हम दिल्ली भी हो आए हैं, लाहौर भी घूमे 

यार मगर तेरी गली,  तेरी गली है।


भले ही उस गली में आड़ी-तिरछी नालियों का जाल बिछा हो, बदबूवाली बयार उस गली में बह रही हो, नालियों में सुअर लोट रहे हों  और एक बार काजल की कोठरी की तरह गली में घुसे तो पैर अति-पवित्र गोबर से सनकर ही वापस, आएंगे। फिर भी यार की गली तो यार की गली ही है। 


हो सकता है कि आपको लड़की दिख जाए, या फिर आप जैसे महान प्रेमी को लड़की के कपड़े सूखते दिख जाएं तो भी आप संतोष ही करेंगे। लेकिन इसमें कठिनाई ये है कि इसमें कई चक्कर लगाने पड़ सकते हैं  और आप काया से बम खटाखट हैं। अगर आप सारी ऊर्जा यार की गली के चक्कर लगाने में ही खर्च कर देंगें तो फिर प्यार हो जाने के बाद होने वाली अंतरंग क्रिया के लिए ऊर्जा कहां से लाएंगे। जबकि शिलाजीत इत्यादि बेचने वाले महान विद्वानों का कहना है कि इस काम में घोड़े के बराबर ऊर्जा की दरकार होती है। 



प्रेम वैलेंटाइन दिवस का मोहताज नहीं होता। हमारे यहां यह क्रिया-कलाप बहुत दिनों से संपन्न किया जाता रहा है। अब जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि आप पड़ोस की बिल्लो रानी पर अरसे से आसक्त हैं और यह बात उन्हें पता भी नहीं है। तो कुछ ऐसा कीजिए कि बिल्लो आप पर रीझ जाएं,-

गलती होने पर पिटाई की भी गुंजाइश 
ऐसा कीजिए कि गले में लाल या ऐसे ही किसी रंग का - जो आंखों में बरछी की तरह चुभ सके- रुमाल गले में बांध लें। फिर उपर से आंखो पर काले रंग का चश्मा। वल्लाह, क्या कहने..। लोगबाग कहते ही होंगे कि काले चश्मे में आप अक्षय कुमार की तरह बंबास्टिक दिखते हैं। तो इसी ड्रैसअप के साथ आप फैशन परेड मे शामिल होइए.. और प्रेम गली के दो-चार चक्कर मार आइए। 


दूसरा तरीका ये है कि लड़की को एकटक देखते रहिए। कभी-न-कभी वह भी आपकी ओर देखेगी। जैसे आंखें मिले आप अपनी दाईं या बाईं ओर की आंख दबा दें। इसे आंख मारना कहते हैं। आपके आंख दबाते ही लड़की आपका पापी मंतव्य समझ जाएगी। हां, इस विधि में खतरा ये है कि लड़की तक अगर आपका मंतव्य पहुंच नहीं पाया,  यानी कुछ कम्युनिकेशन गैप हो जाए, तो लड़की आपको काना या भैंगा समझ सकती है। और हां, काला चश्मा पहन कर भी ये क्रिया संपन्न नहीं की जा सकती।


एक अन्य तरीका यह है कि लड़की जब भी घर से निकले,  यानी घर से कॉलेज तक या स्कूल तक, या फिर ट्यूशन को ही निकले तो आप भी उसके पीछे लग लो। फायदा यह कि या तो आप घर से कॉलेज के बीच कहीं पिट-पिटा जाएंगे,  जो कि प्यार की कठिन राह में बड़ी मामूली बात है, या फिर दो-चार दिनों में लड़की यह जान जाएगी कि यह जो रोज़ मेरे पीछे कुत्ते की तरह आता है,  मुझसे प्यार करता है। इस तरह या तो आप का गठबंधन यूपीए की तरह चल निकलेगा  और आप अभूतपूर्व प्रेमी का खिताब पा जाएगे  या फिर भूतपूर्व। 

वैसे ये सब न चलें, तो कुछ दूसरे तरीके भी है, जिनकी चर्चा फिर कभी करूंगा। कुछ डायरेक्ट ऐक्शन तरीके हैं, कुछ अंगूठियों का कमाल।

जारी...  .


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Sunday, December 5, 2010

कांग्रेस का तो टाइम ही खराब है

मनोज मुकुल 
(लेखक आईआईएमसी] नई दिल्ली के पूर्व छात्र और स्टार न्यूज़ में एसोसिएट सीनियर प्रोडयूसर हैं)
राहुल गांधी ने कहा है कि बिहार के चुनाव नतीजों से वो हताश नहीं हैं। हालांकि ये भी नहीं कहा कि वो खुश हैं। वैसे कहने लायक बिहार ने छोड़ा ही कहां हैं । खैर, बिहार चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए प्रत्याशित तो कतई ही नहीं थे। जिस तामझाम के साथ फिर से खुद के दम पर खड़े होने की तैयारी हुई थी उसमें पलीता लग गया। टिकट का बंटवारा कहिए या फिर बड़े नेताओं का घालमेल, उम्मीदों पर नहीं उतरे खरे। वैसे कांग्रेस के लिए समय ही शुभ नहीं चल रहा है। अक्टूबर-नवंबर और दिसंबर का जो महीना है वो कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है। आदर्श सोसायटी घोटाला, स्पेक्ट्रम घोटाला, बिहार में बर्बादी, जगन मोहन का विद्रोह, सुप्रीम कोर्ट से रोज डांट-फटकार । भाई इतने मुश्किल दौर से मनमोहन सिंह का तो पहला कार्यकाल भी नहीं गुजरा था। यूपीए पार्ट 1 में तो परमाणु करार पर लेफ्ट ने हाथ खींचा तो हाथ बढ़ाने कई लोग आगे आ गए। लेकिन इस बार सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह बड़े बुरे दौर से गुजर रहे हैं। जिसको देखिए वही उनके खिलाफ बोल कर कट ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट हो या फिर सुब्रमण्यम स्वामी, परसों ये भी सुनने में मिला कि ए राजा की तरफ से भी पीएम की चिट्ठी को लेकर अनाप-शनाप कहा गया था। वैसे कहने वाले सब कहते भी हैं कि पीएम साहब की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। लेकिन खाली कहने भर से क्या होता है।

कांग्रेस का हाथ, किसके साथ?
अक्टूबर आखिरी में आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाला वाला मामला सामने आया। अब समय खराब ही कहिये कि जिस अशोक चव्हाण को मुंबई हमले जैसे विकट हालात में सीएम बनाया, वो इतने पुराने मामले में नप गए। जमी जमाई दुकानदारी उखड़ गई। अशोक चव्हाण के बारे में एक और मजेदार बात पढ़ते हुए बढ़िए। अशोक चव्हाण का नाम अक्टूबर से पहले तक अशोक चव्हाण ही हुआ करते थे लेकिन अक्टूबर शुरू में ही उन्होंने अपने नाम को वजन देने के लिए ‘राव’ जुड़वाँ लिया और हो गए अशोक राव चव्हाण। अंक ज्योतिषियों ने साफ कहा कि ये शुभ नहीं है, भारी विपत्ति आने वाली है, 20 दिन भी नहीं बीते कि कहां से फ्लैट का भूत निकला और ले गया। 


जगन : अपनी धुन में मगन 
अब कांग्रेस के लिए एक टेंशन हो तब तो, जगन मोहन रेड्डी, आंध्र प्रदेश के कडप्पा से कांग्रेस सांसद हुआ करते थे। पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश के कांग्रेस छत्रप रहे वाईएसआर के बेटे हैं। इनका बड़ा लंबा चौड़ा कारोबार है। टीवी चैनल से लेकर अखबार तक। अभी 15 दिन पहले इनके चैनल पर सोनिया गांधी, राहुल और मनमोहन सिंह के खिलाफ स्टोरी चल गई। खूब किरकिरी हुई। अब जगन संकट से निपटने के लिए कांग्रेस को वहां के रोसैया को सीएम की कुर्सी से हटाना पड़ा, किरण कुमार सीएम बने। किसी राज्य में नेतृत्व बदलना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान काम नहीं होता। लेकिन मजबूरी में करना पड़ा। इससे क्या हुआ सो जानिए।  जगन मोहन पर दबाव बना और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पांच पन्नों की चिट्ठी लिख सोनिया को बहुत बुरा भला कहा। हालांकि उनके चाचा उनके साथ नहीं गए लेकिन किरण कुमार मंत्रिमंडल में जो मंत्री बने हैं ज्यादा उसमें नाखुश ही हैं। मतलब कि यहां भी कांग्रेस के लिए समय ठीक नहीं चल रहा है। अब उन्हीं की पार्टी का सांसद रहा शख्स पार्टी तोड़ चुका है। सोनिया की अध्यक्षता में पार्टी टूटने की पहली बड़ी घटना है। अभी भले ही चुनाव नहीं है लेकिन अगला चुनाव आसान नहीं होगा। जगनमोहन के पिता वाईएसआर की हेलिकॉप्टर हादसे में मौत हुई और इसके बाद जब सत्ता संभालने की बारी आई तो जगन की महत्वकांक्षाओं को नजरअंदाज करते हुए रोसैया को गद्दी दी गई। उस वक्त जगन ने तो साथ दिया। लेकिन बाद में जगन ने अपनी पिता की मौत के बाद जिन समर्थकों ने खुदकुशी की थी उनके घरों का दौरा शुरू किया। कांग्रेस को ये मंजूर नहीं था जानते हैं क्यों? क्योंकि कांग्रेस के लोग नहीं चाहते कि पार्टी में कोई दूसरे परिवार का नेता क्षत्रप बनकर उभरे। वाईएसाआर अपवाद थे, जिन्हें खुली छूट देना मजबूरी थी कांग्रेस की। 


थॉमस तुम कब जाओगे?
बिहार और दो मुख्यमंत्रियों को नाप कर आगे बढ़ते हैं। स्पेक्ट्रम घोटाले का भूत कब तक पीछा करेगा भगवान जाने। पंद्रह दिन तो हो चुके हैं कहीं महीना न हो जाए संसद को ठप हुए। जेपीसी जांच के दबाव के आगे सरकार की गणित काम नहीं कर रही। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट से रोज फटकार मिल रही है। सीवीसी को लेकर मामला भी सरकार के खिलाफ जा चुका है। सीवीसी पीजे थॉमस का इस्तीफा कभी भी हो सकता है ऐसा बताया जा रहा है। पहले ही जब थॉमस की बहाली हो रही थी तो नेता विपक्ष ने सुषमा स्वराज ने विरोध किया था। लेकिन दो-एक के बहुमत से मनमोहन सिंह ने बना दिया। अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार से लेकर सीवीसी तक सफाई देते फिर रहे हैं। 


कलमाड़ी यानी सबसे बड़ा खिलाड़ी
खेल और भी है। सुरेश कलमाडी को क्यों भूल गए। कॉमनवेल्थ वाले मामले में सीबीआई कलमाडी के मातहत काम करने वाले अफसरों को जेल में डाल चुकी है। किसी दिन कलमाडी साहब से भी पूछताछ होगी। कलमाडी भी पुणे से कांग्रेस के ही सांसद हैं, और बड़े पुराने नेता भी हैं। उधर हिमाचल वाले नेताजी,  केंद्र में इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ भी तो भ्रष्टाचार वाले मामले में शायद चार्जशीट दायर हो ही चुकी है। और हां ये भी जान लीजिए कि रोज जो है कोई न कोई बड़े अफसरों के चरित्र का खुलासा भी इसी में हो रहा है। सो बड़ा मुश्किल भरा टाइम चल रहा है कांग्रेस का। इतना टफ टाइम पार्टी के लिए कभी नहीं रहा होगा, नयी जेनरेशन में। इंदिरा जी वाले टाइम का अंदाजा नहीं है इसलिए कह रहा हूं ।

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